Monday, 2 April 2012

शुक्रिया रणबीर जी,

मेरा विरोध सीधा ’आधुनिकता’ के मूल्य से नहीं था, बल्कि आधुनिकता की जो समझौतावादी मिलावटी नकल हमने तैयार की, उससे था. यह सामन्ती व्यवस्था का विरोध करने की जगह उससे गठबंधन के आधार पर विकसित हुई. ’पान सिंह तोमर’ में मैं इसके कई चिह्न देख पाता हूँ. आपने इतनी तल्लीनता से आलोचना को पढ़ा, उसका शुक्रिया. इन प्रतिक्रियाओं से मेरे लेखन और विचारों को बल मिलता है.

...मिहिर.
 
प्रिय मिहिर,
प्रतुत्तर के लिये शुक्रिया. हो सकता है मेरे कथन में त्रुटी रही हो लेकिन आपका विश्लेषण एकदम सटीक था. सिनेमा की विधा के जरिये अपने समाज के जिन छिपे हुए मनान्दोलनों को अक्सर हम नज़रंदाज़ करके चलते हैं वे ही पान सिंह तोमर जैसे सच्चे आदमिओं में शोलों के रूप में विकसित होकर प्रज्वलित होते हैं लेकिन इसमें विनाश तो बहुत अपनों का ही होता है. राज्य की मशीनरी तो केवल उस परिणति के मात्र एक जरिये के रूप में हमारे सामने आती है. वास्तव में पुलिस और प्रशासन की उत्पत्ति जिस कार्य के लिये हुई उसमें पान सिंह तोमर जैसों को एलिमिनेट करना शामिल नहीं होना चाहिये था. किसी ने पान सिंह जैसों के दर्द को संशोधित करने का प्रयास नहीं किया. नहीं तो उसके बागी बनने की कोई वजह नहीं होती.

1 comment:

  1. 'पान सिंह तोमर' पूरी फिल्म पटकथा में एक (सेना )नायक ही बना रहता है अपने भाव में अनुभाव में, अंदाज़ में ,हर बात में ,वह कहीं भी निगेटिव नहीं हुआ है आखिर तक सकारात्मक बना रहा है .फौज की आन बान और शान पर उसे फक्र है और आखिर तक वह इसी ज़ज्बे को जीता है .पुलिसिया तंत्र की गोली खाकर वह मरता नहीं है .मरता यह तंत्र -लोक है .पान सिंह तोमर तो पूरे तंत्र को सवालों के सलीब पे टांग कर महा -प्रयाण को चला जाता है .मेडिलों को निहारता जो उसकी नजर में एक सौपान हैं ऊंचाइयों का देश की आन बान और शान का , और पुलिसिया तंत्र के लिए धातु के चंद टुकड़े यही संत्रास है पूरी कथा का .

    उसका भाई लहुलुहान आता है अपनों के ही हाथों ,वह तब भी गोली नहीं चलाता .फौजी धर्म निभाता है .'फौजी अपने नागर भाइयों पर हमला नहीं करता . पूरी फिल्म में पान सिंह एक अनुशाशन पर्व है .सब तरफ से बंद रास्ते देख वह अपने हक़ की लड़ाई लड़ता है .उसके बागी तेवर भी हक़ हुकूक के लिए हैं .बधाई रन वीर सिंह जी ,मिहिर भाई आपने ये सवाल उठाए इन्हें प्रासंगिक बनाये रखा उस दौर में जब हमारे सेना -नायक खल नायकों ,वक्र मुखी सांसदों के निशाने पर हैं .जब संविधान के उच्चतर शिखरों ,प्रतिष्ठानों को तोड़ने की एक होड़ सी लगी है दुर्मुखों में .

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