Amir Khan's episodes about 'Honour Killing'

Amir Khan's episodes about 'Honour Killing'
wrongly hits out at Khaaps of Jat Community

'सत्यमेव जयते' टी. वी. सीरिअल में खापों
की निंदा गैर-जरूरी

ऑनर किलिंग के बारे में कल, यानि कि दिनांक जून, रविवार को, प्रसारित हुये एपीसोड को देखने के बाद यह महसूस होता है कि आमिर खान पहले से ही खाप विरोधी मंसूबा बनाये हुये थे. महम चौबीसी के जिन प्रतिनिधियों को मंच पर बोलने के लिये आमिर ने बुलाया वे स्वयं को ठगा सा महसूस करते रहे. उनकी बात पर इसलिये ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया कि इससे पहले आमिर करुणामाय वातावरण तैयार कर चुके थे और पीड़ितों के प्रति समस्त दर्शकों की सहानुभूति सृजित करने में कामयाब हो चुके थे. महम चौबीसी के चौधरी मामूली पढ़े लिखे हैं जिन्हें तो शास्त्र का पूरा ज्ञान है, ही परम्पराओं की सोशियोलॉजी का और ही बाईलॉजी का. आमिर के इस प्रोग्राम की सबसे बड़ी कमी यह रही कि उन्होनें किसी मेडिकल बायोलोजिस्ट या जैव-वैज्ञानिक को नहीं बुलाया. हो सकता है उन्होंनें जानबूझकर ऐसा किया हो क्योंकि मैं उन्हें कच्चा खिलाड़ी नहीं मानता और ही यह मानने के लिये तैयार हूँ कि प्रोग्राम की रूपरेखा बनाते वक़्त वे शोध को समुचित वज़न नहीं देते. खैर, कुल मिलाकर यह केवल एक तरफ़ा प्रोग्राम था जिसका एक परिणाम यह हुआ कि जाटों की बदनामी में थोडा इज़ाफा और हो गया और पूरे देश को यह मालूम हुआ कि जाट कौम अभी कितनी पिछड़ी, गंवार और अविकसित है. जाट कौम की ओर से जिन प्रतिनिधिओं को बुलाया गया था उनकी क़ाबलियत पर गौर करते हुए इतना और जोड़ना चाहूँगा कि इस समय पूरा देश जाटों को लेकर पूर्वाग्रहग्रस्त है. देश की रक्षा करते हुये आज तक, अर्थात पिछले १००० वर्ष में, एक करोड़ जाट कुर्बान हुये हैं और वैदिक परम्पराओं एवं मान्यताओं के चलते हुये उन्होंनें हमेशा ही ऋषि-मुनियों की सीख का पालन किया है. देश का संविधान बनाते हुये प्रत्येक कौम की परम्पराओं का ध्यान रखा गया परन्तु वैदिक परम्पराओं को मानने वाले जाटों की उपेक्षा की गयी. वर्तमान संविधान में गाँव-आधारित प्रजातंत्र तो है ही नहीं. इससे अच्छे तो अंग्रेज़ ही थे जिन्होनें जाटों को केवल इज्ज़त दी वरन उन्हें अनेक बढ़िया और आधुनिक बातें सिखाईं. सीधे-सादे जाटों के साथ मीडिया ने बहुत छल किया है जिसका प्रतिकार करने में वे अक्षम हैं. जो सक्षम हैं वे बंटे हुए हैं और पूर्वाग्रहग्रस्त मीडिया उनकी बातें छापता भी नहीं है. जिन जाटों का मीडिया में कुछ हिस्सा-पट्टी है और जो जाट बहुत पढ़ लिख गये हैं वे इन मसलों के प्रति उदासीन हैं. जाट कौम को इस दुर्गति से निकालने के लिये जाटों का नेतृत्व अब कौम के वैज्ञानिकों और आचार्यों को ही करना होगा ताकि आमिर खान जैसों को भी सद्बुद्धि रहे.

आज तक किसी भी खाप या खाप के चौधरी ने किसी भी गंभीरतम मामले में किसी कसूरवार को शारीरिक सजा नहीं दी है. खाप के चौधरियों में बेशक सम्पूर्ण समझ हो और उन्होंनें कुछ गलत फैसले भी लिये हों लेकिन उन्होंनें कभी अच्छे विचारों को मानने या स्वीकार करने से इनकार नहीं किया. अफ़सोस इस बात का है कि आमिर खान ने भी खापों के विरुद्ध ही माहौल बनाया. यदि किसी के परिवार वालों ने किसी मामले में दूसरे परिवार वालों पर अत्याचार किया, क़त्ल किया अथवा शारीरिक कष्ट पहुँचाया तो इसका दुःख सभी को है और देश का कानून उन्हें उपयुक्त सजा दे इस पर किसी जाट को ऐतराज़ भी नहीं होगा.
It would have been better for Amir Khan to have contacted other people who have done scholarly work not only about the history and functioning of Khaaps as well as the implications of marrying in the same or the bhaichara, i.e. brotherhood, gotra. If we check the history of Pathans and their tribal affiliations for marriages (as collected by the British from 1800 to 1934AD), we would be stunned to know that they have had more conservative norms and conventions than the Jats. The whole tribal history of the people living across the western border of India (Pakistan and Afghanistan) is replete with strict adherence to tribal conventions, rules and regulations. On the contrary rules followed by the Jats are far more liberal, democratic and universal in so far as running their societal issues is concerned. It is in this caste (Jats) only that re-marriage of a widow is allowed with full honor. Khaaps have never recommended or perpetrated crime against any one be they young ones, provided they take into confidence the community and do not violate the minimum level of rules that is considered essential and mandatory for saving their honor. The whole episode's strength was intentionally drawn towards castigating the brave and honest Jats. We would have liked a balanced presentation from Amir Khan rather than making a subtle effort of diverting all energies to throw mud on Jats. He spoiled much of the time in arousing feelings of the victims but provided little opportunity to D.R.Chaudhary and the Khaap leaders to present their points. They were abrubtly intervened. No Jat would ever support criminals or likes to become a party in perpetration of heinous crime against lovers provided certain conditions are followed.  Most crimes against lovers were done by the members of the families of the victims in which Khaap chaudharies had no direct or indirect roles.  However, the conditions that are voluntarily imposed on self have been harmless but preserved the biological and racial traits of the Jat race. Who would not have liked to follow these tenets or to do that? Only those persons are making absurd comments that do not know the history of the Jat race. There is no need for Amir to submit apologies. If the topic selected in his episodes have suceeded in igniting discussions, let people do that but  put no blame on Amir or drag him into controversy. It is the Jats who have to seriously think of bringing vital changes in their social behaviour and response to awkward situation arising out of inter-caste marriages or same gotra marriages or marriage in a bhichara gotra. Let intellectuals from the Jat community make effective intervention into it. Sooner they do it better it will be for their children. However, we only expected Amir Khan to do a little justice to his acumen of presentation.

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