Tuesday, 21 August 2012

Masani barrage's unending wait for rains to fill the reservoir -Rewari

जिला रेवाड़ी में धारूहेडा के निकट मसानी बराज़ को सन १९७८ में तैयार किया गया था और यह अपेक्षा थी की इसके बाद कुदरत अपना काम करेगी. दैनिक भास्कर ने अपने १८ जुलाई के हरियाणा अंक में ब्रेकिंग न्यूज़ के अंतर्गत एक बड़ी ख़बर के तौर पर इस बराज़ के चालू न होने के बारे में चिंता जताई है और कहा है की उस समय २५० करोड़ रुपये खर्च करके इसका निर्माण किया गया था. उम्मीद थी की अच्छी बरसात होने पर जिला अलवर में स्थित तिज़ारा और नूह की तरफ के पहाड़ों से बह कर आने वाले पानी के रेले को यह बाँध र
ोकेगा और निकटवर्ती अंचल में मौजूद ४० गांवों के निवासिओं को इससे आर्थिक फायदा होगा. लेकिन अभी तक बाँध के पीछे का करीब ६० वर्ग किलोमीटर का आगौर खाली पड़ा है. मैंने गूगल अर्थ के सौजन्य से इस बराज़ और इसके आगौर को दखने का प्रयास किया और सफल हुआ. वैसे भी मैं खुद इस बराज़ के ऊपर से चार-पांच बार गुज़रा हूँ और इसके परिवेश को निहारा है. अगले दिन, अर्थात १९ अगस्त को भास्कर ने ख़बर का फोलोअप दिया तो पता चला की ४० प्रभावित गांवों के लोग एक महापंचायत करेंगे जिसमे वे प्रादेशिक सरकार से आग्रह करेंगे कि इसमें पानी लाया जाय ताकि न केवल भू-जल का स्तर ऊपर आ सके बल्कि उन्हें सर्दिओं की ऋतु में सिंचाई के लिये पानी भी उपलब्ध हो. इस मामले में गौर तलब है इस क्षेत्र में पिछले १०० साल में हुई मानसूनी और सर्दिओं में होने वाली बरसात का पैटर्न. यह डाटा न केवल हरियाणा सरकार के रिकार्ड में वरन भारत मौसम विभाग के पास भी उपलब्ध है. बराज़ के पीछे स्थित आगौर में केवल बरसात होने पर ही पानी भराव संभव है, अन्यथा नहीं. अब सवाल यह उठता है की अखबार ने इसमें कौन सा जल भरने की बात कही है ? और, वह जल अगर आयेगा तो कहाँ से और किस स्रोत से ? इस पर न तो चालीस गांवों के बुजुर्गों से बात की गयी और न ही सम्बंधित विभाग के अधिकारिओं से. प्रतीत होता है की उस समय ऐतिहासिक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्रादेशिक सरकार का बराज़ बनाने का निर्णय ठीक था लेकिन बिलकुल ठीक नहीं. हो सकता है यह निवेश एक राजनैतिक निर्णय रहा हो और उस समय स्थानीय लोगों को खुश करने के लिये यहाँ बराज़ बनाया गया हो. चलिये ३२ साल तक यथा मात्रा में बरसात नहीं हुई और जलभराव नहीं हुआ. लेकिन भविष्य में होगी या नहीं यह भी निश्चित नहीं है. ऐसे में सिवाय आशा के और कुदरत द्वारा होने वाले करिश्मे के इंतज़ार के अलावा दूसरा विकल्प नहीं दीखता. लेकिन बराज़ को तब तक बचाना होगा जब तक पानी आने का सपना पूरा नहीं हो जाता.

ग्लोबल वार्मिंग और एल-नीनो के अलावा भारत उप-महाद्वीप में औद्योगीकरण, शहरीकरण, वनों और गोचर भूमि की कमी, घास के मैदानों की सिमटन, विद्युतीकरण और मोटर-गाड़ियों से निकालने वाले धुऐं से बढ़ते जा रहे प्रदूषण आदि की वजह से बरसात के पैटर्न में विगत दो दशकों में भारी बदलाव आया है. सुना गया है कि हरियाणा सरकार बरसाती पानी को कहीं उत्तर से -संभवतः, घग्गर नदी से, बदरो-नेटवर्क के जरिये मसानी बाँध तक पानी लाने की जुगत में है. यह आश्चर्यजनक ही नहीं वरन असंभव होगा और इससे जिला कैथल, फतेहाबाद और सिरसा में नाली क्षेत्र में पारिस्थितिकी को भारी नुकसान हो सकता है. मसानी बाँध क्षेत्र की परिष्ठितिकी भी इससे प्रभावित हो सकती है. हो सकता है की ३२ साल बाँध की संरचना इतनी मजबूत ना रह गयी हो की वह पानी डा दबाव को सह सके जिससे राष्ट्रीय राजमार्ग-८ को भारी क्षति हो. यह वही मार्ग हो जो दिल्ली को जयपुर से जोड़ता है उर आगे अजमेर-अहमदाबाद और मुंबई तक जाती है.

जिला गुड़गांव के सन १९१० के गज़ेटीयर में लिखा है की उत्तरी राजपूताना और जिला गुड़गाँव की बरसाती पानी की निकासी और इसका बहाव उत्तर की और है. रेवाड़ी और इसके पूर्व की ओर के रेतीले, कंटीली झारियों से सराबोर मैदानों में उत्तर में स्थित काला पहाड़ को ओर से पानी का बहाव उत्तर की ओर है लेकिन यहाँ जब भी अधिक मात्र में पानी आया है तो उसने रेवाड़ी को ही डुबोया है. इसकी वजह है अलवर में स्थित तिजारा ओर गुड़गांव में स्थित नूह के पास काला पहाड़ का पश्चिमी वाटरशेड एवं साहिबी में आने वाला फ्लैश-फ्लड. इन स्थितियों में मुझे नहीं लगता कि कभी इतना पानी यहाँ पडेगा जिससे मसानी बाँध में पानी आये. कहीं दूर से पानी लाकर यहाँ जलभराव करना निहायत बेवकूफी होगी. इसे एक राजनैतिक मुद्दा बनने का अर्थ होगा विज्ञान -अर्थात मौसम, भू-भौतिकी और पारिस्थितिकीय अद्ध्ययन की समझ के बिना प्रकृति से छेड़-छाड़. इससे लोगों की मुश्किलें और बढ़ेंगी. सरकार का खर्चा और बढ़ेगा और जानकार लोग हरियाणा के इंजीनियरों, नीति-निर्धारकों और राजनीतिज्ञों को कम-अक्ल समझकर खिल्ली उड़ायेंगे.

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