Wednesday, 5 September 2012

Reservation in promotions for SC & ST is unjustified


दिनांक २५ अगस्त के दैनिक भास्कर में 'खापों के हाथ आन्दोलन की कमान' और ऐसे ही अन्य शीर्षकों से हिंदी भाषा के अन्य अखबारों में छपे समाचारों के अलावा अंग्रेज़ी के द ट्रीब्यून में 'खाप्स सर्व अल्टिमेटम' समाचार से हरियाणा के आम आदमी को किसी बेहतर भविष्य की आशा नहीं होनी चाहिये. जाति के नाम पर आरक्षण देने के लिये भारत के संविधान में कोई प्रावधान नहीं है, खाली इसके कि नीति-निर्देशक सिद्धांतों में ऐसी नीतियाँ बनाने के लिये कार्यपालिका को निर्देश मात्र है कि गरीब तबकों और समाज में पिछडे वर्ग के कल्याण के बारे में सोचा जाये और यथार्थ रूप में कुछ किया भी जाये. राजनेताओं नें अपने स्वार्थ के लिये समाज में जातीय गतिरोध के बीज आरक्षण देकर बोये थे, अब भारत में उसकी फसल लहलहा रही है. इस समय भारत, खासतौर से हरियाणा, में रहने वाले जाट कौम के कुछ अनपढ़, अदूरदर्शी, स्वार्थी, छुटभय्ये और स्वयंभू नेताओं को जाटों के लिए आरक्षण हेतु आन्दोलन करने के अलावा और कुछ नहीं सूझता. इस काम में वे पिछले २-३ साल से जोर-शोर से लगे हुए हैं और राजनेताओं पर दबाव बना कर, धमकी देकर और कुछ नालायक, कामचोर और स्वार्थी जाटों को साथ लेकर मनमाने तरीके से समाज में अराजकता पैदा करने पर तुले हुए हैं. ये लोग किसी की सही बात सुनने के लिये तैयार नहीं हैं चाहे तो इनके कारनामों की वजह से कौम पर बट्टा ही क्यों न लगे, इल्ज़ाम क्यों न लगे और जाट चाहे और भी दुखदायी तरीके से क्यों न पिछड़ जायें, इसकी उन्हें परवाह नहीं है. आज जाटों की गन्दी आदतों के कारण भारत के किसी भी प्रान्त में इन्हें पसंद नहीं किया जाता. कोई भी प्राइवेट संस्थान इन्हें नौकरी में, चाहे वह चौकीदारा ही क्यों न हो, रखने के लिये तैयार नहीं है. केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के जिन दफ्तरों में इनमें से ज्यादातर को क्लास फोर से भी नीचे के दर्जे की नौकरियां मिली हुयी हैं वहां ये ठीक से काम नहीं करते. समय पर दफ्तर में आते-जाते नहीं, दफ्तर के समय को भी बर्बाद करते हैं, उल्टा बोलते हैं, हुकुम-उदूली करते हैं और मौका लगे तो गाली-गलौच करते और मार-पीट भी करते पाये गये हैं. बयिन्तिहाह बीडी पीना और ताश खेलना तो ये लोग अपना जातीय गौरव मानने लगे हैं. दूसरी और आरक्षण के नेता-लोग जाटों के गौरवशाली इतिहास, कौम के जीवट और पुरुषार्थ, कुर्बानियों और परम्पराओं को दरकिनार करके केवल चंद लोगों को बेवक़ूफ़ बनाते घूम रहे हैं. और कुछ नहीं सूझा तो अब खाप के नासमझ और ज्यादातर अनपढ़ चौधरियों के पास समर्थन के लिये चले गये और इनके नाम पर सरकार को धमका रहे हैं कि यदि फलां-फलां तारीख़ तक आरक्षण देने के बारे में घोषणा नहीं हुई तो चक्का जाम और जनजीवन की सामान्य गतिविधि को ठप्प कर दिया जायेगा. धमकियों से भला सरकारें कभी डरी हैं, वह भी तब जब उसमें चोरों और लुटेरों का बोलबाला हो ? दूसरी बात यह कि यदि यह आरक्षण वाली बात सिरे चढ़ती है तो कल के दिन जैन, राजपूत, ब्राह्मन और अन्य ऊपरी कौमें जैसे की बनिया भी आरक्षण में अपना हिस्सा तय करने को कह सकते हैं. बात और आगे बढ़ती है और कोई विकल्प नहीं रहता तो हमारे अदूरदर्शी और स्वार्थी नेता तब अंग्रेजों की तरह समानुपातिक आरक्षण अथवा प्रतिनिधित्व की नीति को लागू करने में देरी नहीं करेंगे. जब यह होना ही है तो सरकार और 'जनप्रतिनिधि' इतने हो-हल्ले का इंतज़ार क्यों कर रहे हैं ? सामाजिक न्याय की अगर बात करें तो वह पिछले ६० बरसों में आरक्षण के जरिये तो संभव हुआ नहीं है. सरकारी नौकरियों में ही आरक्षण का फायदा केवल कुछ लोगों को हुआ है. देश में दरिद्र तो हर कौम और तबके में होते हैं. तो फिर दरिद्रता के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती ? जिस देश में गाँधी और अम्बेडकर जैसे प्रबुद्ध, विचारशील और तार्किक लोगों को भगवान् बना दिया जाये और उनके नाम पर न जाने क्या-क्या प्रपंच रचे जायें वहां जातीय भेद-भाव को समाप्त करना नामुमकिन हैं. व्यक्तिपूजा से सामाजिक समानता को अघात पहुंचा है. ऊंची कौमें जैसे कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वणिक चाहे निचली जाति के लोगों और संकर जातियों से कितना ही अच्छा व्यवहार क्यों न कर लें, निचली जातियां उन्हें हमेशा संदेह की दृष्टि से देखती हैं और देखती रहेंगी, यह सोचकर कि वे किसी भी सूरत में उनसे रोटी-बेटी का नाता नहीं जोड़ने वाले हैं. निचली जाति का कोई लड़का अगर उच्च कौम की किसी लड़की के प्यार के चक्कर में फँस गया या उसे भागकर ले गया तो समझो कि हिंसा होगी. इसमें कानून भी क्या करेगा क्योंकि परंपरा से ऐसा होने की वर्जना जो है. आरक्षण की बात करने वाले और कानून बनाने वाले लोग अपनी बेटियों का रिश्ता नीचे वाली जातियों या कुलों में करके मिसाल कायम कर भी दें तो भी ज्यादातर समाज इस रास्ते पर नहीं चलेगा.खैर, सरकारी नौकरियों में आरक्षण कि मांग करके जाट कौम के कुछ बुद्धिहीन लोग कौम का कोई भला नहीं कर रहे हैं. अगर इन्हें अपनी कौम के भविष्य की इतनी ही चिंता है तो वे आरक्षण को समाप्त करने के लिये दबाव क्यों नहीं बनाते. क्या पिछले दिनों हुआ गुर्जर आन्दोलन इनके लिये एक आदर्श उदाहरण बन गया है ? गुर्जरों से पहले यह पूछो तो सही कि आरक्षण होने के बाद क्या उनकी कौम के सभी युवाओं को सरकारी नौकरी मिल गयी है ? जितना जल्दी जाट जाति की खाप के मुखिया इस आन्दोलन के सर्वविनाशक रूप को पहचान लेंगे, कौम के लिये उतना ही अच्छा होगा. अपने आप को वीर और मेहनती कहने वाली जाट कौम क्या अब आरक्षण की बैसाखी के सहारे अपनी रक्षा करेगी और रोटी कमायेगी ? और यदि आरक्षण मिल गया तो इनमें और उनमें फिर फर्क ही क्या रह जायेगा ? यदि फर्क डालना है तो आरक्षण हासिल करके नहीं बल्कि आरक्षण ख़त्म करवाकर डालना चाहिये और यह देखना चाहिये कि किसी के साथ भेद-भाव न हो. सभी को काम मिले और समाज में शांति से परिश्रम करते हुए, ज्ञान अर्जित करते हुए तरक्की करें. तभी भारत चीन की तरह ऊंचा और ताकतवर हो सकेगा.आरक्षण के इस देश में दो मायने हैं - एक, विधायी संस्थाओं में और दूसरा, नौकरिओं के लिये. मैं और आप सभी ऐसे अनेक युवाओं को जानते होंगें जो हर लिहाज से काबिल हैं और वे सिस्टम और प्रक्रिया को कानूनी तरीके से मानते हुए भी उम्र रहने तक सरकारी क्षेत्र में रोजगार प्राप्त नहीं कर सके. हार कर उन्होनें या तो प्रोपर्टी डीलर बनना चुना, अपराध करना या फिर किसी प्राईवेट नौकरी में कमतर पैसों में नौकरी करना. कुछ ने अपनी दुकानें खोली जिनमें से कुछ कामयाब हुईं और कुछ नहीं. कुछ नें तो भैंसें रख कर डेयरी कर ली और बड़े नगरों में मोटर साईकिल वाले दूध सप्लायर बन गये. आरक्षण का फायदा जिन्हें हुआ उन 'निम्न' जातियों का यहाँ नाम लेने की जरूरत नहीं है लेकिन सरकारी नौकरी मिलते ही ये लोग मगरूर हो गये हैं और आजकल अपने से वरिष्ठ कर्मचारियों और अफसरों को अभिवादन तक नहीं करते. पता नहीं इसमें रहस्य है अथवा साजिश अथवा बदले की भावना ? उच्च जाति के नौजवानों को सरकारी दफ्तरों या बैंकों से जब भी काम पड़ता है तभी रिश्वत दिये बिना काम नहीं होता जबकि 'निम्न' जातियों के जो लोग अफसर बन गये हैं वे अपने लोगों का काम तत्परता से कर देते हैं. बस काम करवाने वाले को अफसर की जाति पता होनी चाहिये. एस.सी. और एस. टी. लोगों ने प्रत्येक दफ्तर में अपने ऐसोसिएशन बना लिये हैं और गलती से अगर जातिसूचक शब्द किसी अन्य के मुंह से निकल गया तो समझिये कि नौकरी के लाले पड़ सकते हैं जब कि इन्हीं में से कुछ भले लोग अन्य को पंडितजी या चौधरी साहब कह कर रोजाना ही संबोधित करते हैं. इनकी शिकायत एस.सी. या एस. टी. कमीशन को होती है और एक बार ऐसा हो गया तो सजा से बचने के लिये उनकी दया पर ही निर्भर होना पड़ता है, नौकरी को खतरा हो गया वह अलग. हो सकता है डिमोशन भी हो जाये. मुल्क में ऐसी व्यवस्था और जानबूझ कर नई एवं बेतुकी प्रणाली चालू करने का क्या औचित्य है ? ऐसे माहौल में तरक्की नहीं हो सकती और वही सब होगा जो मुल्क को गर्त में ले जाने के लिये अब हो रहा है. चाहे लाख अन्ना और केज़रीवाल आयें; भ्रष्टाचार को नहीं होने देने के लिये लोग-दिखावा तौर से चाहे कितने ही सख्त कानून बनाये जायें, तरक्की नहीं हो सकती. आजकल तो गोपाल कांडा जैसे लोग ही ज्यादा सफल हैं बशर्ते उनके राजनैतिक आका उन पर मेहरबान रहें. उल्टा किसानों की जमीन छीनने के लिये पुराने कानून को गलत बता कर या उसका गलत इम्प्लीमेंटेशन करके और साथ में किसानों को पैसे का लालच देकर जमीन हथियाने के सभी संभव उपाय किये जा रहे हैं. हथियाई गयी जमीन में से बहुत सी तो प्राईवेट डेवलपर्स को ऊपर का पैसा लेकर बांटी जाती रही है. जितने भ्रष्ट और निम्न-स्तरीय जनप्रितिनिधि आजकल देखने को मिलते हैं इतने तो अंग्रेज़ कभी नहीं हुए थे. इसीलिये बड़े-बूढ़े अक्सर कहते हैं की इससे तो अंग्रेजों का राज़ ही अच्छा था. आजकल तो दुष्टता और ध्रष्टता की हदें पार हो गयी हैं. इसीलिये भारत के बेहतरीन दिमाग पलायन या राजनीति को श्रेष्ठ मानते हैं.

अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों के लिये आरक्षण में भी कोटा देने के संघीय मंत्री-मंडल के निर्णय के बाद इसे संसद में पास करवाना कोई ज्यादा मुश्किल काम नहीं दीखता. इस सत्र में नहीं तो अगले में सही, यह पास हो ही जायगा. लेकिन क्या भारत में सामाजिक रूप से पिछड़ी हुयी जातियों के उत्थान के लिए यही एकमात्र उपाय बचा है ? आरक्षण ने आपसी वैमनस्य के जो बीज पहले बोये हैं वे अब वृक्ष बन गये हैं. इन्हें और सींच कर वाट-वृक्ष बनाया जा रहा है. इससे ऊपरी जातियों माय मन पर क्या बीतेगी और उनके बच्चों के धूमिल होते भविष्य को कौन संभालेगा, इसकी चिंता हमारे अदूरदर्शी और स्वार्थी नेताओं को जर्रा भर नहीं है. वे तो अपनी रईसी और अमीरी के सहारे और विदेशों में जमा दौलत के बल पर भविष सुखमय बना लेंगे, लेकिन उपरी जातियों में जिस प्रकार की आर्थिक दरिद्रता पैदा हो चुकी है वह क्या सामाजिक विद्रोह को जन्म नहीं दे रही ? दूसरे और मुसलमान, ईसाई और बौद्ध अपने लिये आरक्षण की मांग तेज़ कर रहे हैं. यदि आखिर में बात समानुपातिक प्रतिनिधित्व पर आकर ठहरने है तो अभी से इसके बारे में फैसला क्यों नहीं लिया जाता. बंदरबांट से पिंड तो छूटेगा. दैनिक हिन्दुस्तान में छपे संलग्न सम्पादकीय लिख में उत्कृष्ट तर्क देकर मामले पर तटस्थ रौशनी डाली गयी है जिसे हमारे नेताओं को पढना और लागू करना चाहिये.

दिनांक ५ सितम्बर को भारत की संसद के ऊपरी सदन में दो सांसदों के बीच आरक्षण को लेकर जो हाथ-पाई हुयी वह इसी और इशारा करती है की यदि नौकरियों के अतिरिक्त पदोन्नति में भी आरक्षण हुआ तो हंगामा संसद के अन्दर ही नहीं बहार भी होने की सम्भावना है.

No comments:

Post a Comment