मांडू.........भोजदेव परमार से बाज़ बहादुर और मल्कोम तक















आ, लौट के आजा मेरे मीत,
तुझे मेरे गीत बुलाते हैं.
घुमक्कड़ व्यक्ति धार और मांडू के बारे में क्या लिखते हैं? खंडहरों के बारे में काव्यात्मक लेखन या इतिहास के कुछ चुनींदा पहलुओं के बारे में अपने प्रभाव. व्यक्तिगत सोच का प्रभाव और प्रकृति की गोद में हर मौसम में खंडहरों पर दिखने वाले प्रभाव जिसे ऐतिहासिक काल-खण्डों में वे समेटने की कोशिश करते रहे हैं. करीब-करीब सभी लोगों के लघु और विस्तृत लेखों में ऐसे तत्व शामिल रहते हैं जो इतिहास के उन पहलुओं पर सर्वेक्षण करते दीखते हैं जो अब नहीं हैं. घटनाओं का विस्तृत ब्योरा कहीं उपलब्ध नहीं हैं हलाकि कालातीत ब्योरों से कुछ बातों का इल्म जरूर होता है. I am not speaking about main stream and high profile scholar-researchers. मांडू और धार के अधिकतर भवन अब वैसे नहीं हैं जो आज से तीन सौ-पांचसौ वर्ष पूर्व थे अथवा राजा भोज और मूंज के काल में थे. इस्लामिक शासकों ने करीब-करीब सभी हिन्दू भवनों को बेरहमी से नष्ट कर दिया और नए भवन नष्ट किये भवनों से प्राप्त सामग्री और कुछ नई सामग्री से तैयार किये. अब अधिकतर भवन वे हैं जिन्हें मुसलमान शासकों के समय में बनाया गया था. अंग्रेजी शासन काल के कुछ अच्छे लिखित सन्दर्भ हमें अठारहवीं सड़ी के उत्तरार्ध से मिलने लगे और द्वितीय स्तर के शोध-प्रकाशन और ट्रेवल राइटिंग की यह प्रक्रिया अभी तक जारी है. लेखन के लिए धार और मांडू एक ऐसा 'जीवित' सन्दर्भ है जो सर्वकालिक और सर्वप्रिय है. चार यात्रा करने के बाद अभी एक-दो यात्रा करने की और इच्छा बनी हुयी है. अभी मेरे मित्र निर्देश कुमार सिंह ने धार की भोजशाला और इसमें कभी मौजूद रहे रहस्यमयी ४३' ४" ऊंचे लौह स्तम्भ (इसके तीन टुकड़े मौजूद हैं) के बारे में अपने ब्लॉग पर एक शानदार लेख पोस्ट किया है. धार में तथाकथित भोज शाळा जिसके होने-न-होने पर अनेक प्रश्न चिन्ह लग चुके इन, में दिलावर खान द्वार लाकर डाल दिए गए इस लौह स्तम्भ के सबसे बड़े और निचले हिस्से, पर आई.आई.टी कानपुर के धातु-विज्ञानियों ने परीक्षण करके बताया की महरौली की लोहे की लाट की तरह यह भी ढलुवां और पिटवां तकनीक से बनाया गया और जंगरोधी है. मांडू का वैभव हर काल में बना ही रहा है. लेकिन परमारों के युग से लेकर शाहजहाँ तक जो था वह अंग्रेजों के काल में नहीं था और जो सन १८७० के बाद अंग्रेजों ने देखा वह अब नहीं है. अब मांडू के पठार पर छोटे-छोटे गाँव नुमा बस्तियां उभर रही हैं. ये सब खेती और पशुपालन में लगे लोग हैं. इन्हें न टूरिस्टों से वास्ता हैं, न खंडहरों से. नीचे खायी में भी अनेक गाँव आदिवासियों के हैं जो हाट लगने के दिन और भगौरिया उत्सव के दिन अधिसंख्या में प्रकट होते हैं. पर्यटक और शोधार्थियों के लिए मांडू के स्मारक अलग-अलग मायने रखते हैं. मौसम के अनुकूल इन स्मारकों-खंडहरों का मिजाज़ भी बदलता है. लेकिन बाज़-बहादुर और रूपमति की प्रणय-गाथा और इनका दुखद अंत सर्वोपरि है. घुम्मकड़ लोग अकसर इनका जिक्र करना भूल जाते हैं

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