बावड़ियों के अभिकल्प Story of Haryana step wells-1

मेरे विचार से जितनी संख्या में बावड़ियां भारत में बनी उतनी और कहीं, किसी और देश में तो नहीं ही होंगीं. यहाँ तो जितनी बावड़ी, उतने डिजाईन या अभिकल्प.
उत्तर पूर्व भारत को छोड़कर पूरे हिन्द-देश में बावड़ियों की उपस्थिति हमें सोचने को प्रेरित करती है पातळ या भू-गर्भ में पानी के स्रोत तक पहुँचने और इसे थोड़े-से श्रम से प्राप्त करने के लिए अत्यधिक श्रम और अक्लमंदी से जो निर्माण भारत में हुए वे आज पानी को लेकर आज हमारे वतन की धरोहर सूची में शामिल हैं.
बावड़ियों
को हमने अनेक नाम दिए. अनेक तरह से इनका अलंकरण किया, इनकी रक्षा के उपाय किये और इन्हें एक तरह के भू-गर्भीय जल-मंदिर समान माना. कभी संयुक्त पंजाब का हिस्सा रहे अब के हरयाणा भू-भाग में भी दर्जनों बावडियों का निर्माण सत्रहवीं सदी के मध्यकाल से ही शुरू हो गया था. उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों तक भी यहाँ बावड़ी बनायी गयी. फिर यह परम्परा रुक-सी गयी. कारवाँ काफिलों और सैन्य-पथों पर दोनों की आवाजाही किसी और तरीके से होने लगी. लगता नहीं कि पंजाब में ब्रिटिश काल के उदय से लेकर बाद के कुछ और दशकों या उन्नीसवीं सदी के उत्तर काल तक पहुंचते हरियाणा प्रदेश में किसी और नयी बावड़ी का निर्माण हुआ हो.
कस्बे और नगरों के अलावा यहाँ गाँव में भी वावडी बनायी गयी. सिर्फ पानी के लिए बावड़ी बनी हो ऐसा नहीं था. आमोद-प्रमोद और उत्सव का आयोजन भी ऐसे स्थलों पर होना कोई आश्चर्य न था. तालाब और बावड़ी के मामले में संभवतः नारनौल जैसा भाग्यशाली नगर हरयाणा में दूसरा नहीं है. बावड़ी किसी ने भी बनवाई हो, इसे इस्तेमाल करने का सौभाग्य सब का था. नहाना-धोना, पीने के लिए पानी भर कर ले जाना हो या पशुओं को पानी पिलाना हो, सबको छूट थी. बारी आने पर सब कतार में लग जाते. अपनी जरूरत का पानी लेते और अपने ठिकाने पर लौट जाते. इन पर स्वच्छता रखना सबकी जिम्मेवारी थी. बनवाने वाला नज़र रखता कि कोई दुर्घटना न हो, झगड़ा न हो और समय-समय पर जब जरूरत होती मरम्मत करवाना भी वह अपनी ही जिम्मेवारी समझता था.
इसी प्रसंग में नारनौल में शहर के पश्चिमी छोर पर सम्राट अकबर के समय के यूनानी पद्धति के हकीम जिलान अली द्वारा बनवाई गयी बावड़ी का इतिहास में एक रूतबा बना. सिर्फ कुयाँ या सीढियां बनायी गयी ऐसा नहीं सोचा गया. बड़ी विस्तृत सोच से काम लिया गया और इसे एक आमोद-प्रमोद और नायब जलस्रोत के रूप में बड़ी लग्न से तैयार किया गया. ऐसा आज इसके अवशेष को देख ही महसूस होता है.
निर्माणकर्ताओं ने नारनौल भू-भाग और प्राकृतिक स्रोतों का ठीक से, बड़ी समझ से मुआयना किया होगा. अरावली की उत्तरी शाखाओं के पूर्व की ओर दोहन नदी की एक शाखा के किनारे बसा हुआ नारनौल मुग़ल काल में एक निजामत का दर्ज़ा रखता था. अकबर ने यहाँ एक टकसाल बनवाई जिसे खेतड़ी नगर की खदानों से ताम्बा धातु मिलती थी. चांदी और सोना कहीं और से आता रहा होगा. यहाँ सिक्के ढाले जाते रहे.
दोहन नदी एक एक शाखा नगर के पशिचिमी छोर को छूकर निकलती थी जो आजकल सिर्फ मल-जल ढोती है. बरसात में उफन कर बहने वाली इस नदी का पानी कुछ मील के फासले पर उत्तर की ओर बहकर धरती में ही जज्ब हो जाता है. लेकिन इससे पहले यह नारनौल नगर की धरती के गर्भ को मीठे पानी से भर देता है.
इसी से २०० गज दूर पहाड़ों की ओर निकल जाने वाले रास्ते पर जिलान अली के वास्तुकारों ने एक बावड़ी की स्थापना का सु-विचार किया होगा. इस अंग्रेजी के अक्षर 'एल' के आकार में स्थापित किया गया और एक हल्की-सी ऊंचाई की चाहर दीवारी भी की गयी ताकि घुमक्कड़ पशु भीतर न घुसें. कुआं बनाया गया और इस तक पहुँचने के लिए पचासेक पैड़ियों को नीचे तक उतारा गया. सब कुछ चूने और अनगढ़ पत्थरों से बना. पैड़ियों के दोनों ओर बरांडा बनाया गया. कुएं से संलग्न दीवार में भी बरांडा युक्त स्थान तैयार किया गया जिसमें एक द्वार इसलिए लगाया गया की कुएं के पानी को रौशनी और हवा मिले. पत्थरों से चिने गए थम्भों पर बरांडे की छत को 'लदा' वाली छत के रूप में तैयार किया गया. इसे अंग्रेजी में 'वॉलटेड रूफ' कहा जाता है. बावड़ी के लिए एक खूबसूरत प्रवेश द्वार न बनाया जाए ऐसा कैसे हो सकता था. असल में इस प्रवेश द्वार को एक लघु महल का रूप दिया गया और इसे 'ताज' के रूप में शीर्ष पर एक 'तख़्त' बनाया गया. प्रवेश द्वार के माथे पर बावड़ी के बनवाने वाले ने खुदा का नाम लिखा, नीचे अपना लेकिन किस हिजरी सन में यह मुकम्मल हुआ इसका कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है सिवाय अनुमान के, की इस बावड़ी का निर्माण ई. सन १५८०-१६०० के बीच कभी हुआ होगा. हो सकता है एक-दो दशक पहले भी हुआ हो. लेकिन एक सूत्र हाथ लगा है. बावड़ी परिसर की पूर्वी भुजा पर अर्थात कुएं के पूर्व की ओर के चबूतरे पर दीवार के सहारे जिलान अली साहब की संग-ए-मरमर की कब्र पर जो इबारत मौजूद है उस पर उनकी मौत का हिजरी सन उभरे फ़ारसी शब्दों में खुदा है. इसे कुछ दिन पहले 'एपिग्राफिका इंडिया' की टीम ने दर्ज किया है.
बावड़ी परिसर में इबादत के लिए एक छोटी-सी मस्जिद भी बनायी गयी थी जिसके खंडहर भी पांच साल पहले गिर कर ढूह में तब्दील हो गए. बावड़ी का भव्य प्रवेश द्वार उत्तर की ओर स्थापित हुआ तो इससे बाहरी दृश्य सुन्दर दिखे इसके लिए धरती के स्तर से डेढ़ मीटर तक की ऊंचाई तक बनाए गए चबूतरे पर एक फव्वारा स्थापित किया गया जिसे पानी देने के लिए कुएं के 'पाड़छे' का स्तर फव्वारे में जल-प्रवेश के स्थान से कम से कम दो मीटर ऊंचा रखा गया.पानी को बावड़ी की परिधि पर बनी उघड़ी नालियों द्वारा फव्वारे तक पहुंचाया गया. पूरे परिसर में नीम और आम के अनेक वृक्ष लगाए गए थे ताकि यह शीतल रहे. जानकार बुजुर्ग लोग जिनसे मैं पहली नारनौल यात्रा के दौरान सन १९९४ में मिला था मुझे बता गए कि इनके बचपन के दिनों तक भी बावड़ी परिसर चालू था और शहर के लोग इस स्थान पर सुबह-ओ-शाम 'गोठ' करे थे.
इस परिसर को ठीक-ठाक करने की बाबत अनेक बार सुन चुका हूँ लेकिन आज २५ साल बाद इसकी हालत और खस्ता हो गयी है. अब लोग इस स्थान को फारिग होने के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं. ४०० साल में सोच इस कदर गिर चुकी है.
[चित्र- बावड़ी का प्रवेश द्वार एवं अग्र भाग. छायांकन, अप्रैल २०१५]

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