Aversion of common person towards maps, map reading

 नक्शों के प्रति आमजन की अरुची

भारत में मिडिल क्लास फॅमिली के घरों में से शायद ही किसी घर के स्टूडेंट्स के पास स्कूली एटलस मिलेगी. नक्शा रखने और इसकी रीडिंग में भारतीय आमजन की कोई ख़ास रुचि नहीं, लेकिन अभ्यास से मैं स्पेस से लिए गए मैप फीचर्स को काफी हद तक सही इन्टरप्रेट कर लेता हूं. बचपन से रुचि होने के कारण मुझे दिशा ज्ञान भी अच्छा है. गूगल मैप्स में और किताब की दूकानों से कमर्शियल तरीके से छापे गए मैप्स में प्लेस नेम्स के हिज्जों में बहुत ही गलत तरीके से नाम लिखे गए हैं. चूंकि शुरूआती या आधार माप जोकि सर्वे ऑफ़ इंडिया बनाता है, अंग्रेजी भाषा के प्लेस-नेम्स इस्तेमाल करता है, इसलिए स्थानीय शब्दों का ट्रांसलेशन करते समय गलतियों की भरमार है. में सिर्फ वे ही नक़्शे इस्तेमाल करता हूं जिन्हें सर्वे ऑफ़ इंडिया के दफ्तर के सेल काउंटर से खरीद कर लाता हूं. दिल्ली पुस्तक मेले में सर्वे ऑफ़ इंडिया की स्टाल से बहुत नोग एटलस और नक़्शे नहीं खरीदते, जबकि प्राइवेट पब्लिशर गलत नामकरण वाले नक़्शे बड़ी संख्या में बेच जाते हैं. जाहिरा तौर पर यह जागरूकता की कमी है. गलत नक़्शे और नक्शों में गलत छापे गए प्लेस-नेम पढ़कर स्टूडेंट्स या अन्य लोग कभी ठीक सूचना प्राप्त नहीं कर सकते. नक्शों की कई प्रकार होती हैं. हमें सभी किस्मों को ठीक से बांचना आना चाहिए.
मीडिया की बात करें तो आजकल ग्राफ़िक्स पर भी ध्यान है, लेकिन तकरीबन ज्यादातर पत्रकार नक्शा बांचने में बहुत कमज़ोर हैं. जर्नलीज्म की किसी भी ग्रेजुएट या पोस्टग्रेजुएट डिग्री के दौरान नक्शा अध्ययन पर कोई ध्यान नहीं है. उनका कहना है कि यह काम जियोग्राफी के स्टूडेंट्स का है. गूगल मैप्स को फॉलो करते हुए लोग अक्सर खुद को खाई, तालाब या निर्जन क्षेत्रों में पाते हैं और गूगल को गालियाँ निकालते हैं.
डेविड बुइसेरेट की 2003 की किताब 'द मैपमेकर्स क्वेस्ट: डिपिक्टिंग न्यू वर्ल्ड्स इन रेनेसां यूरोप' इस विषय को बहुत अच्छे ढंग से समझाती है। हालाँकि, हमें इस बात पर भी आलोचनात्मक नज़र डालनी चाहिए कि भारत में यूरोपियों के आने से पहले यहाँ के लोग आधुनिक मानचित्र-कला (कार्टोग्राफी) क्यों विकसित नहीं कर पाए. समुद्री जहाजों और ज़मीनी सेना की गतिविधियों के कारण ही यूरोपियों को इस दिशा में सोचने और चार रंगों वाले नक्शे छापने की ज़रूरत महसूस हुई. हमने कभी कागज़, प्रिंटिंग प्रेस या टाइप-फेस का आविष्कार नहीं किया. इसके बजाय, हम 1970 के दशक तक तख्ती या लकड़ी के बोर्ड पर लिखने पर ही ज़ोर देते रहे. जब हम इतिहास से जुड़े नोट्स लिखते हैं, तो मानवीय प्रतिभा और आविष्कारों को समझने के लिए हमें विकास और पहलों को कालक्रम के अनुसार सही ढंग से प्रस्तुत करना चाहिए. लगभग यही हाल हिंदी भाषा के मामले में है. यूं बेकार की बहसें हिंदी दिवस पर मीडिया में दिखाई देती हैं, लेकिन अलंकार के शास्त्रीय विषय पर भारत से बेहतरीन ज्ञान किसी देश के पास नहीं था. इस किताब को पढ़ने से मुझे फायदा हुआ. जबकि मास मीडिया, साहित्य और साहित्य में लालित्यपूर्ण भाषा तीन अलग डोमेन्स हैं. फिर भी साधारण रुप वाली भाषा में भी लालित्य प्रकट हो सकता है, बशर्ते लेखक विद्वान है.
दुनिया भार में नक्शों को बनाने का काम यूरोपियन नाविकों और बाद कॉलोनियल टाइम्स में यूरोपियन सर्वेयर्स ने ही किया था. एशियाई और अफ्रीकी देशों के स्थानीय लोगों को उस तरीके से साइंटिफिक नक़्शे कभी बनाने नहीं आये जैसे यूरोपियन लोग बना सके. अभी यूनाइटेड नेशन्स जनरल असेम्बली में एक प्रस्ताव पास हुआ है कि दुनिया में नक्शों में पृथ्वी में महाद्वीपों और प्रयाद्वीपों और द्वीपों के नक्शों में साइज़ और कन्अटूर्स के मामले में सुधार किया जाए. भारत ने ज़्यादा सटीक वर्ल्ड मैप पर यूनाइटेड नेशन्स प्रस्ताव का समर्थन किया.
भारत ने यूनाइटेड नेशन्स जनरल असेंबली के एक प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया है. इस प्रस्ताव का मकसद दुनिया के नक्शे को ठीक करना है ताकि महाद्वीपीय ज़मीन के हिस्सों को ज़्यादा सही ढंग से दिखाया जा सके. 193-सदस्यों वाली यूनाइटेड नेशन्सजनरल असेंबली ने शुक्रवार को भारी बहुमत से नक्शा ठीक करें प्रस्ताव को मंज़ूरी दी. इसका मकसद ग्लोबल मैप में ज़मीन के हिस्सों को सही अनुपात में दिखाना और दुनिया के अलग-अलग इलाकों, खासकर अफ्रीका, को बराबर प्रतिनिधित्व देना है. इस प्रस्ताव को टोगो ने पेश किया था. इसे 164 वोट मिले. एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया, जबकि अमेरिका ने इसके खिलाफ़ एक वोट दिया.
प्रस्ताव में कहा गया है कि 16वीं सदी में नेविगेशन (रास्ता खोजने) के मकसद से बनाया गया 'मर्केटर प्रोजेक्शन' आज भी शिक्षा, मीडिया, डिजिटल और सरकारी कामों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है, जबकि इसमें भूमध्य रेखा से दूर उत्तर और दक्षिण की ओर ज़मीन के हिस्सों का आकार काफी बिगड़ा हुआ दिखता है. प्रस्ताव में इस बात पर भी चिंता जताई गई कि इस गड़बड़ी की वजह से अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का आकार असलियत से छोटा दिखता है और दुनिया के बारे में एक असंतुलित नज़रिया बना रहता है। जनरल असेंबली में वोटिंग के बाद, यूनाइटेड नेशन्स में भारत के स्थायी मिशन के फर्स्ट सेक्रेटरी रघु पुरी ने कहा कि भारत इस प्रस्ताव के पीछे के मकसद का "स्वागत" करता है, जिसका लक्ष्य नक्शा बनाने के ज़्यादा सही और सही प्रतिनिधित्व वाले तरीकों को बढ़ावा देना है.
उन्होंने कहा, "हमारा मानना है कि नक्शे इस बात में अहम भूमिका निभाते हैं कि समाज भूगोल और हमारे आस-पास की दुनिया के आकार-प्रकार को कैसे समझते हैं. हालांकि, भारत ने इस प्रस्ताव के दायरे के बारे में अपनी समझ साफ करते हुए कहा, "हमारा मानना है कि इस प्रस्ताव को 'इक्वल एरिया मैप प्रोजेक्शन' के ज़्यादा इस्तेमाल और उस पर विचार करने के समर्थन के तौर पर समझा जाना चाहिए, न कि 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' या किसी खास मैप प्रोजेक्शन को मंज़ूरी देने के तौर पर."
पुरी ने कहा कि 'इक्वल एरिया प्रोजेक्शन' खास तौर पर इसलिए अहम हैं क्योंकि वे महाद्वीपीय और क्षेत्रीय ज़मीन के हिस्सों के असल आकार या क्षेत्रफल को बनाए रखते हैं. "इससे ज़मीन के आकार को लेकर होने वाली गलतफहमियों को दूर करने में मदद मिल सकती है, जो मुख्य रूप से आकार, दिशा या दूरी जैसी भौगोलिक विशेषताओं को बनाए रखने के लिए बनाए गए प्रोजेक्शन के कारण होती हैं। साथ ही, अलग-अलग प्रोजेक्शन अलग-अलग कार्टोग्राफिक उद्देश्यों को पूरा करते हैं. कोई भी एक प्रोजेक्शन हर काम के लिए सही नहीं होता. पुरी ने कहा, 'इसलिए, हमारा मानना है कि इस प्रस्ताव का तकनीकी और कार्यप्रणाली के मामले में निष्पक्ष रहना ज़रूरी है. हमारा प्रतिनिधिमंडल उस भाषा का समर्थन करता है जो सटीक कार्टोग्राफिक प्रस्तुति को बढ़ावा देती है और साथ ही देशों, संस्थानों और कार्टोग्राफरों को यह तय करने की आज़ादी देती है कि उनकी खास ज़रूरतों के लिए कौन सा प्रोजेक्शन सबसे सही है.”लेकिन विवादित क्षेत्रों के नक्शों की एप्रूवल कौन देगा, यह देशों की सरकारों पर निर्भर है.

Comments