भारत के प्रिंट मडिया को बदलना होगा

भारतीय मीडिया में संदर्भो की भारी कमजोरी देखने में आती है. इसलिए उनके लेखों (ओपिनियन पेज) और सम्पादकीय लेख में दिए गए वक्तव्य सिर्फ एक इम्प्रैशन नज़र आते हैं. माना कि यह एक विचार है, लेकिन इसे ऑथेंटिक नहीं बनाया गया तो में इसे स्वीकार नहीं करता बेशक संपादक या लेखक कितना भी अनुभवी और योग्य है. मीडिया इस मामले में अपना रुख बदलने को तैयार नहीं और इसीलिए प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन दिनों-दिन घाट रहा है. उन्हें बदलना होगा.


मैंने जितने भी डाक्यूमेंट्स वर्ल्ड वाइड वेब पर अभी तक हिमालय के ग्लेशियरों और क्लासिएर झीलों से खतरों के बारे में देखे हैं उनमें से बस दो-चार का सन्दर्भ अंग्रेजी के अकबारों ने दिया है, लेकिन हिंदी के अखबारों के लेखक इस मामले में एकदम रद्दी साबित हुए हैं. भारत के नेशनल रिमोट सेंसिंग केंद्र ने हिमालय से निकलने वाली सभी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की एक एटलस तीन साल पहले ही बना ली थी. इन सभी पर नियमित निगरानी रखी जाती है, लेकिन डाटा अपडेट करने में वक़्त लगता है और जब तक डाटा अपडेट होकर खतरे का अहसास होता है, हालात बदल चुके होते हैं. आपदा की तुरत सूचना मिलना और इसे ट्रांसमिट करने से पहले ग्राउंड लेवल की तसल्ली ड्रोंस आदि उड़ाकर की जाती है. कुछेक जगहों पर ग्राउंड पर सेन्सर्स भी ड्राप किया जा सकते हैं जो ग्लेशियर की हिम के भीतर के बदलावों की तुरत सूचना देता है. नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर के टूट कर गिरने से करीब १०० मिलियन टन मलबा गिरा था जिसने भयानक, भूकम जैसी हलचल पैदा की था.

हिमालयी ग्लेशियल झील सूचना प्रणाली भी भारत के पास है और यह बढ़िया काम करती है. मध्य हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों से जुड़े खतरों का एटलस मार्च 2023 तक की जानकारी देता है. जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के पीछे हटने के कारण मध्य हिमालय क्षेत्र को ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों से बड़े खतरों का सामना करना पड़ रहा है.

'हिमालयी ग्लेशियल झील सूचना प्रणाली' को ग्लेशियल झीलों की सूची तैयार करने, महत्वपूर्ण झीलों को प्राथमिकता देने और GLOF (ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़) के कारण बाढ़ के फैलाव की मॉडलिंग और जोखिम का आकलन करने के लिए विकसित किया गया है. ग्लेशियल झीलों की मैपिंग करने और हाइड्रोलॉजिकल, ज्यामितीय, भौगोलिक, स्थलाकृतिक और प्रशासनिक जानकारी जैसी विशेषताएं तैयार करने के लिए हाई-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट डेटा का उपयोग किया जाता है.

यह प्रणाली चुनिंदा महत्वपूर्ण ग्लेशियल झीलों के लिए GLOF बाढ़ के फैलाव के नक्शे और जोखिम के नक्शे भी उपलब्ध कराती है. संभावित जोखिमों को समझने और इन खतरों को कम करने की रणनीतियां बनाने के लिए यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण है. नेपाल-तिब्बत सीमा पर आपदा का दिन 26 अगस्त है, और सदन संपन्न मीडिया के लोगों के पास पर्याप्त समय थी उन दस्तावेजों को देखने और समझने का जो निःशुल्क उपलब्ध हैं और ऑथेंटिक हैं. इसके साथ-साथ वे सन 2023 के बाद के रिसर्च अपडेट्स सम्बंधित जर्नल्स से देख सकते थे और सम्बंधित एजेंसीज से बातचीत करके यह तो मालूम कर ही सकते थे कि जरूरी सूचना का अभाव क्यों रहा और क्यों घाटे में रहने वालों को इसकी सूचना नहीं दी जा सकी. कुछ चीजों और किसी संभावित घटना के किस निश्चित समय के भीतर होने की अग्रिम सूचना टेक्नोलॉजी के जरिये से प्राप्त करना संभव नहीं होता. बस यही गैप नेपाल घाटी में 4000 मनुष्यों को लील गया.

एक बात और भी है जिसे मैंने व्यक्तिगत तौर से अनुभव किया: थोड़े से अंतराल से जेनरेट की गयी लेख रूपी नयी सूचना को संपादक लोग तीन-चार दिन के अंतर से भी प्रकाशित करने के लिए संवेदनशील नहीं हैं. परसों मैंने जब एक संपादक को अपडेट भेजा तो उन्होंनें बिना पढ़े या एक नज़र मारकर ही निर्णय ले लिया कि मेरा लेख प्रकाशित नहीं होगा. आखिर कोई सम्पादक क्यों क्रिटिकल मीडिया रिव्युज प्रकाशित करने को तैयार नहीं होते जबकि इसे ऑब्जेक्टिव तरीके से लिखा गया था? वे खुद की समीक्षात्मक टिप्पणी बर्दाश्त नहीं करते. लेकिन सोशल मिदा हमें यह छूट देता है कि जो बात प्रिंट में नहीं आ सकती, उसे हम यहां पोस्ट तो कर सकते हैं, लेकिन यह निश्चित नहीं कि कौन पढ़ेगा और और कौन रेस्पोंस देगा. 

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