Tuesday, 21 February 2012

हरियाणवी सिनेमा के बहाने कुछ चर्चा

Despite presence film making in Haryana not adequately evolved
हरियाणवी सिनेमा के बहाने कुछ चर्चा 

(यह चर्चा  दो व्यक्तिओं -रणबीर सिंह और सुशोभित शक्तावत के बीच नेट पर है संवाद के संपादित अंशों पर आधारित है. इसे केवल अकादमीय परिप्रेक्ष्य में समझना उचित होगा)

'सिनेमा को समझने के लिए महान फिल्‍में देखने से बेहतर कोई और रास्‍ता नहीं। दुनिया की क्‍लासिक फिल्‍मों, टॉप 100 फिल्‍मों वगैरह की सूचियां इंटरनेट पर मुहैया हैं। पुस्‍तकें भी इंटरनेट पर मिल जाएंगी। आइज़ेंस्‍ताइन से लेकर ब्रेसां और गोदार से लेकर फ़ेलिनी तक सिनेमा की कई सैद्धांतिकियां हैं। हमारे यहां सत्‍यजित राय, रित्विक घटक हैं। यह एक व्‍यापक विषय है और इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में अभी तक इस पर यथेष्‍ट काम नहीं हुआ'।-सुशोभित शक्तावत 

मैं हरियाणा में रहता हूँ और हरियाणवी सिनेमा के इतिहास पर एक किताब लिखना चाहता हूँ. मैंने जब इस बारे में सम्बंधित लोगों से बातचीत की तो उन्होंने सहयोग नहीं किया और यह सोचा होगा कि इस आदमी का  साथ देने के बजाये क्यों खुद ही इस काम को स्वयं कर लिया जाये. वे सक्षम तो थे नहीं. उन्होंनें मुझसे आईडिया उधार तो लिया लेकिन तीन बरस बीत जाने के बाद भी कुछ कर नहीं पाये हैं. मुझे नहीं लगता की वे कुछ कर पाएँगे . हालाँकि मैं उन लोगों को किसी मायने में कमजोर मान कर नहीं चल रहा हूँ. आप तो जानते हैं की इस काम में गहरी प्रतिद्वंदिता है. विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता और जनसंचार एवं हिंदी विभागों में जो पी. एचडी. शोध करवाये जाते हैं उनमें से किसी गाईड को भी इस महत्वपूर्ण विधा के आलोचनात्मक इतिहास को कलमबद्ध करवाने का विचार अभी पनपा नहीं है.वैसे इस तरह के काम को प्रतिबद्धता से वही करेगा जो आप जैसी समझ के साथ कुछ-कुछ जनूनी भी होगा. मैने भारतीय सिनेमा के बारे में कुछ किताबें देखी तो हैं लेकिन वे आलोचनात्मक नहीं हैं- रणबीर सिंह 

Writing a book on the History of Haryanvi Cinema (there are about 70 feature films so far in Haryani language.)-encompassing its genesis, growth and development is my wish. I envisaged this as necessity, for most of it is bad copy-work of Bollywood. Regrettably there is no Prakash Jha in Haryana. Recently one veteran actor Mr. Jagat Jakhar passed away. I don't know the reason that made him so ill that it turned out be fatal for him but probably it could be due to some sort of personally acquired problems. His colleagues have now vowed to release posthumously his last production -अनपढ़ जाट, that he could not accomplish during life time and independently and not able to manage a public release due to paucity of funds. The issue seems to have acquired a more emotional proportion than relating to art, cinema and communication.....and thereafter the sympathizers collectively impressed upon the administration of the State to make available adequate funds as grant for completing the unfinished task. 
A 'film festival' or rather a gathering of film watchers on free is also annually held at Yamuna Nagar in which an academically sound and recognizable system of evaluation of  cinema from Haryana or in the language of the State has failed to evolve despite a good presence of self-styled 'scholars' and 'critics' of cinema including a few film personalities associated in any way with Haryana! It is amazing that honest attempts for critical evaluation of the feature films and cinema as a medium of communication as well as its performance as growing industry of art in Haryana got scuttled due to parochial reasons most of which are non-academic such as bias for language, region, race and caste and ego. There should have been academic attempts by Universities in Haryana but there is complete silence on that front as most producers, financers, actors and script/story writers don't really prefer evaluation lest it may expose them to the tenets of review.
Haryanvi cinema grossly lacked acumen in story writing, script development, direction, skilled work in cinematography, screen-play, editing, copy-writing, costume and location selection, dialogue delivery, acting, music and what not. Most film were as good as caricatures of stories and characters or rather non-stories and did not last long in the memory of the people and critics, the least. I would say that there were no critics or author-writers that were properly qualified or knew about evaluation of a documentary and feature-film. Efforts are under way at Kurukshetra University to train interested people in film appreciation as the first course was completed in Feb. 2012. The course content, the academic status of the teachers/trainers could be known only after a time and only if a review or performance report is prepared by the authorities of the University.

I had seen Mughal-e-Ajam four-five times  with the intention to find faults/lacunae/errors but there were none. On the other hand watching old 'classics' such as Naya Daur, Madhumati, Bees Saal Baad, Bandini, Baijoo Bawra, Kohinoor, Saheb Bibi aur Ghulam, Payasa, Kagaj kay Phool and a few more Guru Datt movies becomes a delightful experience.  Guru Dutt's creations were superb in the sense that it moved one's emotions to higher degrees and one felt concerned and attached to the central character. Though Guru's moves dealt with deeper melancholia of humans and seemed to be dealing with a desire to be introvert but we knew, it depended what kind of association the movie-watchers could develop with the film characters and what type of impression a Guru Datt's movie was capable of leaving on the audience. (Irrespective of the fact that there could be a hundred type of audiences and scenarios). I don't think making money  was the motive with Guru Datt rather it seemed that he was deeply anguished and wanted to express it through cinema in which Mr. V.K.Murthy, the Phalke award winner cinematographer helped him in doing some special effects that could be blended with human emotion, particularly the pathological one.- Ranbir Singh
"पश्चिम में विकसित सिनेमा यहाँ, अपने देश में, संचार के लिये एक सशक्त माध्यम इसलिए नहीं है, क्‍योंकि एक सांस्‍कृतिक परंपरा के रूप में हमारी सिनेमाई संवेदना नहीं है। ठीक वैसे ही, जैसे हमारी औपन्‍यासिक संवेदना नहीं है। पद्य और रंगमंच हमारे ज्‍़यादा क़रीब ठहरते हैं, बनिस्‍बत गद्य और सिनेमा के। सिनेमा गद्य है। सिनेमा एक टेक्‍स्‍ट है। विजुअल टेक्‍स्‍ट है। फ्रांस में न्‍यू वेव आंदोलन चला तो उन्‍होंने कहा कि निर्देशक सिनेमा का ऑथर होता है, लेखक होता है, इस आधार पर उन्‍होंने एक ऑत्‍योर थ्‍योरी बनाई। सिनेमा एक उत्‍तर आधुनिक प्रविधि के रूप में और अधिक उर्वरता प्राप्‍त कर रहा है और लिटररी थ्‍योरी के क्रिटिक्‍स उस पर बहुत अच्‍छा लिख रहे हैं।


दूसरे, सिनेमा समय में, काल में आधारित माध्‍यम है और हमारे यहां समयबोध जैसी चीज़ नहीं है, इतिहासबोध नहीं है, हम मिथकजीवी प्राणी हैं।
मुझे हैरत होती है कि हमारे यहां सिनेमाई संवेदना का किस तरह से अभाव है। मैं कोई भी हिंदी फिल्‍म देखते समय बेचैन हो जाता हूं। मुझे लगता है कि हमारे निर्देशक के पास कहने को कुछ नहीं है, इंगित करने को कुछ नहीं है, उसका स्‍पेस उसके नियंत्रण में नहीं है, वह स्‍पेस में आयाम नहीं रच पा रहा है, सिनेमा की लय उसकी पहुंच से बहुत दूर है। आप किसी भी मास्‍टर का काम उठाकर देख लीजिए, वर्नर हरसोग, अंतोनियोनी, ओजू, बर्गमैन, फ़ेलि‍नी, आप पाएंगे कि उनके सिनेमा और हमारे यहां जो बंबई में बनाया जाता है, उसमें सहस्राब्दियों का फ़ासला है। और यह बात मैं बिना किसी पूर्वग्रह के, दुनियाभर की सैकड़ों फिल्‍में देख डालने के बाद कह रहा हूं।
हमारे यहां सत्‍यजित राय ने कुछ अच्‍छा काम किया, वे जॉन फ़ोर्ड और ज्‍यां रेनुआं का अपना उस्‍ताद मानते हैं। रित्विक घटक फ़ेलिनी को अपना उस्‍ताद स्‍वीकारते हैं। इनके सिनेमा में कुछ क्षण आपको मिल सकते हैं। पथेर पांचाली देखें तो आप पाएंगे कि यहां निर्देशक का अपने कथासत्‍य और अपने कथादेश पर नियंत्रण है। पथेर पांचाली 1955 में बनी थी, एक शू-स्ट्रिंग बजट के साथ। आज 66 साल बाद भी हम पथेर पांचाली जैसी किसी फिल्‍म के आसपास नहीं पहुंच सके हैं।
भास्‍कर में जो मेरा लेख छपा था, उसकी मूल थीम यही थी। रंगमंच बनाम सिनेमा। ये दोनों कथासत्‍य को निरूपित करते हैं और विजुअल माध्‍यम हैं, लेकिन इन दोनों के ग्रामर में ज़मीन-आसमान का अंतर है। ब्रेसां ने अपनी किताब में पूरी ताक़त से इसे स्‍थापित किया है। मुझे लगता है हमारे सिनेमा की सबसे बड़ी त्रासदी आज भी यही है कि हम रंगमंच की आदत से मुक्‍त नहीं हो पाए हैं, इसीलिए हम लाउड और मेलोड्रैमिक हैं। हमारे यहां बैकग्राउंड स्‍कोर सुनें, संवादों की टोन सुनें, गाने सुनें। पश्चिम की फिल्‍मों में गाने नहीं होते, जिंदगी में भी नहीं होते। हमने एक नकली सिनेमाई संवेदना रची है। हम तालीपीट दृश्‍य विधान और संवाद योजना रचते हैं। यह बहुत बड़ी क्षति है। संवेदना के स्‍तर पर, अधिग्रहण के स्‍तर पर।
हमारी सांस्‍कृतिक बहुलता को देखते हुए मैं बहुत शिद्दत से यह महसूस करता हूं कि हम अपने क्षेत्रीय रंगों को लेकर बहुत सुंदर डॉक्‍यूमेंट्री फिल्‍में बना सकते हैं। कथाफिल्‍में नहीं, वृत्‍तचित्र। हरसोग ने दुनियाभर की नेटिव संस्‍कृतियों को लेकर इस दिशा में बड़ा काम किया है एक एंथ्रोपोलोजिकल दृष्टिकोण से।
ख़ैर, जैसा कि मैंने कहा यह एक बहुत व्‍यापक विषय है और ईमेल पर इस बारे में विस्‍तार से बात नहीं की जा सकती। मैं फिर दोहराता हूं, आपके विराट संकल्‍प के लिए मैं शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।
(नेशनल बुक ट्रस्‍ट ने सत्‍यजित राय के सिनेमा पर चिदानंद दासगुप्‍ता की एक किताब छापी है। वह शुरुआत करने के लिए उपयोगी हो सकती है। सिनेमा पर प्रमोद सिंह का यह ब्‍लॉग भी आपके लिए उपयोगी होगा http://cinema.blogspot.com/ ख़ासतौर पर इसमें सालभर पहले छपा वह लेख : सिनेमा का गल्‍प-सुशोभित शक्तावत 
Is there any criteria for selection of a movie as classic or the guidelines that help identify a movie as classic. In scientific research publications there is a criteria as I work in a top research Institution and publish research too in Indian Journal of Medical Rersearch.  Scientometrics is a branch of scientifically studying research and research output of individuals as well as institutions. Has anyone done some statistical analysis of the entire number of films produced in India since Alam Ara/Harishchandra that helped determine a movie as 'Classic' irrespective of the numbers that went to see a movie....its total earnings...........the number of days it ran etc. etc. These days it is hard to keep a tab on such numbers as lots of CDs/DVDs are sold in market and nobody is aware how many people see it or how many times it is exchanged between friends until it becomes obsolete or technically not feasible to watch as quality deteriorates with successive runs. I would be glad to know from you the methods through which we academically assess the worth of movie or from other popular view points. I have seen a few classic movies, particularly the SciFi movies on the TV as well as SciFi film festivals organized by American Centre at Delhi. Which elements go in for classifying a movie as classic? If there were a universal academic or statistical criteria it would enable me to categorize a small number of Haryanvi movies that I wish to evaluate. I wish to scientifically determine their status so that it cannot be challenged on flimsy or self-determined grounds. I could not locate such things on the NET and if there were a book that contained this information apart from the peer-status and qualifications, I would be glad. However, I suppose, in international film festivals certain criteria is applied to adjudge be best of the entries from countries. The selection criteria should be available at some place, including the internet.- Ranbir Singh रणबीर सिंह 

स्टिल फ़ोटोग्राफ़ी सिनेमा का पहला सोपान है। एक फ्रांसीसी फ़ोटोग्राफ़र है ऑनरी कार्तिए ब्रेसां- Henri Cartier Bresson. गूगल पर सर्च कीजिएगा। इस व्‍यक्ति को स्टिल फ़ोटोग्राफ़ी का पितामह कहा जाता है। सत्‍यजित राय के सिनेमा के कई बिम्‍ब ऑनरी महोदय से प्रेरित हैं। किस फिल्‍म को कल्‍ट क्‍लासिक माना जाए, इसका कोई तय पैमाना तो है नहीं। जर्मन फिल्‍मकार हरसोग अक्‍सर एक्‍सटेटिक ट्रुथ की बात करते हैं। शायद वे विस्‍मय और आनंदारितेक को सिनेमा का एक महत्‍वपूर्ण तत्‍व मानते हैं। एक कभी नहीं देखा गया लैंडस्‍केप, कभी नहीं सोचा गया विचार। 

तकनीक के स्‍तर पर क्रांतिकारी कदम उठाने वाली फिल्‍में क्‍लासिक मानी जाती रही हैं। जैसे बैटलशिप पोटेमकिन में आइजेंस्‍ताइन द्वारा किया गया मोंताज का प्रयोग। या सिटीजन केन में आर्सन वेल्‍स के डीप फ़ोकस। या ओजू के पिलो शॉट या स्‍टेटिक मूवमेंट या ज़मीनी शॉट। कुरोसावा के छापामार कैमरे, जो अप्रत्‍याशित दृश्‍य विधान रचते थे। गोदार के जम्‍प कट्स और उत्‍तर आधुनिक सीक्‍वेंस। बेला तार के मिनटों लंबे टेक। अंतोनियानी का बेहलचल सिनेमा। बर्गमैन के क्‍लोज़ अप। सत्‍यजित राय का प्रगीतात्‍मक यथार्थवाद। ये भी तकनीक के स्‍तर पर किए गए काम हैं। फिर विषय वस्‍तु है। ट्रीटमेंट है। बिम्‍ब विधान है। 

इतालवी लेखक इतालो कल्‍वीनो ने कहा था कि हमें क्‍लासिक्‍स इसलिए पढ़ना या देखना चाहिए, क्‍योंकि ऐसा करना उन्‍हें न पढ़ने या न देखने से बेहतर है। अलबत्‍ता क्‍लासिक्‍स का पैमाना तो ख़ैर उन्‍होंने नहीं ही बताया था। हमारे यहां शोले, मुग़ले आज़म को क्‍लासिक कहा जाता है। अभी रॉकस्‍टार आई तो उसे क्‍लासिक कहा गया। मुझे लगता है यह तुलनात्‍मक हो सकता है। यह आपके अवबोध की संपन्‍नता पर निर्भर करता है कि आप किसे क्‍लासिक मानते हैं। दुनियाभर का सिनेमा देखने से पहले मैं प्‍यासा या देवदास को क्‍लासिक समझता था, लेकिन आज इनके बारे में विचार करता हूं तो सिनेमा कला की दृष्टि से इन फिल्‍मों में कई जगह फांक नज़र आती है। संरचनागत संपूर्णता नहीं है। 

रोजर एबर्ट की ग्रेट फिल्‍म्‍स सीरिज़ मशहूर है और पूरी दुनिया में उसे मानक माना जाता है। वह पूरी की पूरी इंटरनेट पर उपलब्‍ध है। वर्ष 2007 में जॉन रोलैंड ने टॉप सौ फिल्‍मों की सूची तैयार की थी। यह संपूर्ण सूची नहीं है और इस तरह की अनेक सूचियां अभी तक बनाई जा चुकी हैं। फिर भी यह सूची कई महत्‍वपूर्ण फिल्‍मों को कवर करती है। आप यदि इनमें से कुछ फिल्‍में प्राप्‍त कर पाएं तो आप तुलनात्‍मक रूप से समझ पाएंगे कि क्‍लासिक क्‍या है। जैसे जापानी फिल्‍मकार यासुजिरो ओजू की टोक्‍यो स्‍टोरी है। आप सबसे पहले यह फिल्‍म कहीं से प्राप्‍त कीजिए। इसे देखने के बाद हम बरबस कह उठते हैं, दिस इज़ क्‍लासिक, और जब हम ऐसा कहते हैं तो हम जाने-अनजाने क्‍लासिक के श्रेष्‍ठ उदात्‍त मानदंड भी तय कर रहे होते हैं, अलबत्‍ता उन्‍हें शायद इतनी अच्‍छी तरह डिफ़ाइन नहीं किया जा सकता।- सुशोभित शक्तावत 


4 comments:

  1. I am very delighted to see your blog which will be providing in-depth knowledge & information about our cultural heritage.

    Sanjat Verma

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  2. दूसरे, सिनेमा समय में, काल में आधारित माध्‍यम है और हमारे यहां समयबोध जैसी चीज़ नहीं है, इतिहासबोध नहीं है, हम मिथकजीवी प्राणी हैं।
    Ranbir singh ji writes with ease of expression spontaneously on any subject .

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  3. हमारी शुभकामनाएं.

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  4. He is continuously measuring new horizons.Congratulations ,Ranbir singhji shekhaavat ji .Happy Holi .

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