Saturday, 25 August 2012

Need to set up a Science & Lingustics university at Meerpur (Rewari)

दिनांक २५ अगस्त के दैनिक भास्कर में छपी खबर कि 'यूनिवर्सिटी बनाने के लिये पंचायतें भी आगे आयीं' एक उचित कदम कहा जा सकता है. अहीरवाल क्षेत्र में एक विश्विद्यालय की जरूरत थी, इसीलिये जिला महेंद्रगढ़ में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी. लेकिन मीरपुर गाँव में रीजनल सेंटर का दर्ज़ा बढ़ाकर विश्वविद्यालय किये जाने की जरूरत है या नहीं इसके लिये विमर्श करना होगा और खर्चे का अनुमान भी लगाना होगा. विश्वविद्यालय की स्थापना करने को कहना आसान होता है लेकिन इसे स्थापित करना और कुशलतापूर्वक संचालित करना एक चुनौती. मीरपुर में एक विश्वविद्यालय बनायें लेकिन सामान्य नहीं. इसे विज्ञान और भाषा शास्त्र के अध्ययन के लिये विशेष रूप से स्थापित किया जाये तो बात बने. हरियाणा की बोलियों पर अध्ययन करने के लिये अभी किसी भी विश्वविद्यालय में प्रबंध नहीं है. भाषाओँ अर्थात लिंग्विस्टिक्स में विशेष अध्ययन और शोध के अलावा प्रलेखन को बढ़ावा दिया जाना एक निहायत ही वैज्ञानिक जरूरत है जिसे तत्काल शुरू किया जाना चाहिये अन्यथा हमारी बोलियों का शब्द भण्डार रीता होता रहेगा. पहले ही अनेक शब्द प्रचलन से बाहर हो चुके हैं. भला हो आचार्य जगदेव सिंह ढुल का जिन्होनें सन १९७१ तक हरियाणा की भाषा बांगरू पर शोध कार्य संपन्न कर लिया था. उनके सहोद ग्रन्थ को सन १९७३ में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने 'ए देस्क्रिप्तिव ग्रामर ऑफ बांगरू' शीर्षक से प्रकाशित किया था. वे ९८ वर्ष की आयु तक भी हरियाणी भाषा की व्याकरण पर काम करते रहे थे.

खैर, हरियाणा में मीरपुर में अगर विज्ञान के विषयों के अद्ध्ययन एवं शोध के लिये विश्वविद्यालय की स्थापना के लिये जोर लगाना चाहिये क्योंकि इससे तरक्की के नये रास्ते खुलेंगे.


इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी है कि हरियाणा सरकार गुड़गांव के सैक्टर ६८ में एक नया विश्वविद्यालय बनायेगी. शायद यही वज़ह है कि मीरपुर में उसकी दिलचस्पी नहीं है. अहीरवाल के लोगों को होशियारी से काम लेना होगा.
 

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