धरातलीय ओजोन के कारण कम होती खाद्यान्न उपज
जिला सोनीपत में आंवली गांव के मेरे पड़ौसी गांव के मित्र कल कह रहे थे कि उनके खेत में गेहूं की उपज अबकी बार उम्मीद से कुछ कम हुयी है. कहा कि इस बार 60 मण प्रति एकड़ निकला है अर्थात पुराने, देसी मण हिसाब के करीब 24 क्विंटल प्रति एकड़. उन्होंनें अबके बार शरबती 306 किस्म बोयी थी. मैंने कहा यह भी बहुत है. मैंने उन्हें कहा शुक्र है इस बार वायुमंडल में कार्बनडाइऑक्साइड और सतही ओजोन कम थी. मौसम काफी साफ़ था, बेशक बाद में ठण्ड कम हो गए, लेकिन रात का तापमान भी फसल पकने के समय तक ठीक-ठाक रहा. उन्होंनें थोड़ा उदास भाव से कहा कि ईश्वर की मर्जी. किसान के लिए कुदरत ही ईश्वर है.
क्रॉप साइंस बहुत टेढ़ी होती है. अनेक बातों पर उपज का दारोमदार टिका होता है. फिर भी किसान मेहनत करते हुए, अनुभव और वैज्ञानिकों की सलाह से देश में गेहूं, धान, मोटे अनाज (बाज़ार, ज्वार रागी, जौ) की ठीक-ठाक उपज लेता है. मौसम की नाराजगी जैसे कि बरसात, ओला वृष्टि, और माघ महीने में अचानक तापमान में गिरवट आना और पारा चढ़ने से फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. खरीफ की फसल अगर बाढ़ में डूब जाए या अतिवृष्टि हो जाए तो ज्वार, बाजरा का फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. फसलें अगर ठीक-ठीक रहती हैं तो देश में अनाज की कमी नहीं होती और सबको उचित मूल्य पर अनाज मिलता है. देश में चावल, गेहूं और बाजरा अनाजों की अधिक खपत होती है. इनकी किस्में भी अलग-अलग है और रिसर्च से बहुत कुछ ठीक-ठाक रखने की कोशिश होती है. देश में कृषि अनुसन्धान परिषद् और एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटीज़ अगर न हों और किसान और भगवान भरोसे सभी किस्म की फसलों और बागवानी को छोड़ दिया जाये तो फिर से खाद्यान्नों का अकाल हो सकता है.
समुद्र के तापमान और मौसम में बदलाव लाने की इसकी बड़ी भूमिका और वायुमंडल को प्रभावित करने की इसकी क्षमता के अलावा वायुमंडल में स्थानीय तौर से धरातल के निकट गैसों की कम्पोजीशन की मॉनिटरिंग और फसलों पर इसके प्रभाव का अध्ययन भी वैज्ञानिक लोग लगातार करते हैं जोकि उपज का आकलन करने में सहायक फैक्टर है. अभी दो-चार पहले ही आईआईटी खड़गपुर के महासागर, नदी, वायुमंडल और भूमि विज्ञान केंद्र (कोरल) में प्रोफेसर जयनारायणन कुट्टीपुरथ ने चेताया है कि धरातल के निकट ओजोन और कार्बन डाइऑक्साइड की अधिक उपस्थिति से और सूर्य का पूरा और साफ़ प्रकाश पर्याप्त समय तक फसलों को न मिलने से देश में अनाज की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. उनकी स्टडी महत्वपूर्ण है. हालांकि इस प्रकार की स्टडीज दशकों से हो रही हैं और पहले भी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हो चुकी हैं, लेकिन सवाल यह है कि हम क्या कर सकते हैं. धरातल के निकट ओजोन और कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा को स्थानीय तौर से कम तो कर ही सकते हैं जिसके बढ़ने के कारण नगरों और बड़े औद्योगिक ठिकानों के बहुत दूर-दूर तक के खेतों में वायुमंडल में गैसों की कम्पोजीशन में बदलाव आता है और यह उसी समय करीब 40 दिन बना रहता है जब खाद्यान्न फसलों की बढ़वार और बीज को गरिष्ठ होकर पकने का समय होता है अर्थात जनवरी और मध्य फरवरी तक.
प्रोफेसर जयनारायणन कुट्टीपुरथ ने शोधपत्र एनवायरनमेंट रिसर्च जर्नल के 15 जून सन 2025 के अंक में तो लिख दिया, सरकार ने भी सम्बंधित समाचार मास मीडिया में देख लिए होंगें, लेकिन मुझे नहीं लगता कि देश के सभी किसानों ने इसे देखा हैं. उन लोगों ने भी देखा होगा जो फैक्ट्रीज को चलाते हैं और वाहनों के कारण वातावरण में धुंआ छोड़कर इसे जहरीला बनाते हैं. जयनारायणन कुट्टीपुरथ ने अपने शोधपत्र में जिन जटिलताओं की बात की है, वे आम आदमी की समझ से बाहर हैं लेकिन एक सामान्य सन्देश यह है कि हमें कारण मालूम हो चुका और निदान भी है, लेकिन इलाज़ को लागू करने में जो अडचनें हैं वह विविध हैं जो लोगों के स्वभाव, नित आदतों, कानूनों, ईंधन की किस्म, ऊर्जा के साधनों की किस्म और उपलब्धि, सुविधा- असुविधा और पॉलिटिकल 'विल' से सीधा वास्ता रखने वाली है. इसलिए सारा दोष सरकार में सर मढना उचित नहीं. दीर्घ कालीन नीतियों में इलेक्ट्रिकल वाहन और वायु प्रदूषण को कम करने के भरसक उपाय किया जा रहे हैं. तब तक उम्मीद करिए कि कुदरत की मशीनरी अपना काम करती रहे. लेकिन स्थिति चिंताजनक के भयावह होने में देर नहीं लगेगी.

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