Monday, 27 August 2012

SORDID PREVALENCE OF SUPERSTITIONS AND MYTHS

SORDID PREVALENCE OF
SUPERSTITIONS AND MYTHS

The history of inculcating scientific temperament in our countrymen during the late 1980s and early 1990s has been documented by National Council of Science and Technology
Council (NCSTC), a science-popularizing wing functioning even nowadays under the Department of Science & Technology of Govt. of India. Vigyan Prasar, another body for popularizing

science among masses was born out to propagate the magnanimous work undertaken during the above noted countrywide movement launched with much fanfare and later acclaim of having made a positive impact. As a scientific communicator I had, in a way, got associated with Vigyan Jathas and closely watched its functionaries to perform various tasks under strain. I had once requested Dr. Narender Sehgal, Director of NCSTC and spearheading the movement under the worthy guidance of Prof Yash Pal to assess and study the impact on of the Jathas and the Movement left on the mindset of the people but told that it was difficult to quantify it. However, certain indicators developed by social scientists could be selected and applied for assessing the changes in the living conditions of our people, particularly the common man living in small towns and village communities, as well as the environment and a report was carefully prepared. After much deliberations, the software selection and preparation committee of the science popularization movements, launched twice, had developed several types of affordable material for inculcating an interest in science. It was immensely popular with the school level children. One of its major fallout was beginning of a Children’s Science Congress, annually co-held at the same venue determined for organizing Indian Science Congress.

Breaking the centuries old myths and superstitions was one of the major tasks during the twice-organized popular science movements in India. Both the scientific community as well as the national governments universally acclaimed the gigantic effort across the globe. These movements would have acted as catalyst upon which the people were supposed to acquire better understanding of science and technology, particularly in the Indian national context, and sustain it too. But regrettably, the society in general kept itself aloof only because as a pre-condition it would require some sort of basic and formal educational standards, which were absent. In spite of communicating science and technology in simple terms and local language, the people remained uninterested in acquiring scientific information by dint of which they could have certainly improved their way of living and thinking about the world around them. Another reason for failure of the people to acquire scientific temperament was the mass-psyche of the society that feared its local mentors so much that it became impossible for them to unshackle from the grip of superstitions and myths. For centuries local faith healer and Guru, practicing witchcraft, forbade the illiterate and the timid Indian to accept modern scientific knowledge and change his mindset according to newly acquired knowledge. Fearing a backlash from such wicked persons as noted above, the common person had no other option but to remain an instant for victim for them. Instances of witchcraft and faith healing in India come to notice only because a few of the gory incidents get immediately reported in the media. The State has no effective role except taking action in accordance with the provisions of the Cr.P.C and only if there was a complaint against the perpetrator. It is too much to expect of a Sarpanch, most of which are semi-educated having political agenda, to be having a scientific temperament. The architecture of our social system that runs our life in general in addition to the architecture of modern political system that shapes the mental environment is of non-scientific nature. It is another matter, that in spite of these constraints we still learn science and attain technological feats but without really having a scientific temperament. Your editorial –Superstitious sarpanch, (The Tribune, 27 August 2012) is a hitting piece of comment on the sordid milieu that persists even after massive inputs –both materially and educationally, in science popularization in the last three plan periods. It was terrible to learn that the father killed the feverish girl child instead of seeking treatment at a govt. run hospital. Whatever happened at village Bhinder Kalan (Punjab) is not an isolated incident but a common one throughout India. How many of our village Headmen know about the work of NCSTC, Vigyan Prasar and a number of other scientific institutions that have created new knowledge for the betterment of the fellow citizens and how many of them access the websites of these organizations for acquiring information about their activities? Obviously, the number is negligible. Our civilization has been gradually built upon folklore that makes it difficult to recognize modern science as way of life and see our scientists and technocrats something as icons.

Sunday, 26 August 2012

Endangering lives of Haryana sportspersons via the commercial route

जिला सोनीपत के गोहाना नगर में आज २६ अवस्त २०१२ के दिन हरियाणा के मुख्यमंत्री चौधरी भूपिंदर सिंह हुडा ने सरकारी इंतजाम के तहत एक अभिनन्दन सभा का आयोजन करवाकर उन खिलाड़ियों को अति महंगी कारें उपहार में दीं जिन्हें वे या तो पहले की तरह बेच देंगे अथवा कुछ दिन चलाकर, डिब्बा बनाकर इधर-उधर कर देंगे. वास्तव में अपेक्षा से अधिक और लेने वाले की औकात से ज्यादा धन-राशि एवं उपहार देकर हम अपने खिलाड़िओं के सम्मान के नाम पर राजकोष से सार्वजानिक धन का अपव्यय कर रहे हैं. मज़ा तो तब था जब खुद करोड़पति मुख्यमंत्री महोदय अपनी जेब से इतनी धनराशी और उपहार लुटाते और व्यक्तिगत कोष में से इसका इंतजाम करते. और, यह सब उनके अपने गाँव या शहर के घर पर होता. प्रसंगवश, यह आयोजन तहसील के भैंसवाल गाँव में होना था जहाँ से योगेश्वर पहलवान आते हैं. लेकिन विगत रोज़ बरसात होने से स्टेडियम में पानी खड़ा हो गया था, इसलिये स्थान परिवर्तन की योजना चार दिन पहले ही तय हो गयी थी. अपार धन-राशि देकर हम अपने खिलाड़िओं को गलत संदेश दे रहे हैं. इन्हें राज्याश्रय मिले इसमें किसी को ऐतराज़ नहीं होगा, लेकिन सार्वजानिक कोष से इन्हें व्यक्तिगत ईनाम के तौर पर धन प्रदान करना अनुचित ही नहीं बल्कि एक नैतिक अपराध भी मना जाना चाहिये. लेकिन आज के दौर में नैतिकता की बात सुनता ही कौन है ? राज्य की खेल नीति पर पहले भी मैनें सवाल उठाये थे कि इसके कार्यानवयन से खिलाड़ियों में व्यावसायिक भावना का उदय होगा और वे अमरीकी खिलाड़ियों के रास्ते पर चल निकलेंगे. लेकिन अफ़सोस, किसी ने ध्यान नहीं दिया.

इस बार ओलम्पिक में पदक जीत कर आने वाले और अन्य प्रतिभागियों के लिये जिस प्रकार से धन कि वर्षा हुयी है वह आश्चर्यजनक और चिंताजनक इसलिये है कि इसके दुष्परिणाम जल्दी ही हम सबके सामने आ जायेंगे. हमारे यहाँ स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स में न्यूरो-फिज़ियोलोजिस्ट और स्पोर्ट्स फिज़ियोलोजिस्ट की नियुक्ति नहीं होती. न ही प्रशिक्षण के दौरान खिलाड़ियों की शरीरक्रियाओं को दर्ज़ करके वैज्ञानिक रीति से उनका रिकार्ड रखने और उन पर शोध करने का कोई उपक्रम किया जाता है. केवल डोपिंग, अर्थात नशीली एवं बलवर्धक रासायनिक दवाओं के सेवन पर थोड़ी नज़र रखी जाती है. ऐसे में खिलाड़ी अपने शरीर को आवश्यकता से अधिक, खतरनाक स्तर तक स्ट्रेच करते हैं और या तो चोट खा कर कंडम हो जाते हैं या फिर उनकी मौत हो जाती है. ऐसी अनेक घटनाओं की रिपोर्टिंग स्पोर्ट्स-विज्ञान के जर्नलों में हो चुकी है. लेकिन खिलाड़ियों के वर्तमान स्वस्थ्य और भविष्य के दीर्घ जीवन की किसे परवाह है ? व्यक्तिगत अहम् की तुष्टि और राजनैतिक लोकप्रियता के चलते उक्त खतरों से अनजान खिलाड़ियों को बली का बकरा बनाया जा रहा है और हमारे वैज्ञानिक संस्थानों के वैज्ञानिक भी विवशतापूर्वक सब देख रहे हैं. लेकिन वे नौकरशाह वैज्ञानिक जो ठहरे. सरकारी डांट या सजा के डर से वे भी चुप रहना बेहतर समझने लगे हैं.

मैं जब छोटा था तो मैनें मेजर ध्यानचंद को झांसी में हाकी खेलते है देखा था. उनके हुनर को तब मैं क्या समझता ! लेकिन वे लालची नहीं थे और केवल हाकी खेल से प्यार करते थे. पूर्ण निष्ठावान थे इसके प्रति. मेरे पिताजी उन दिनों वहीं पर भारतीय बख्तरबंद डिविज़न-१ में तैनात थे. आजकल के खिलाड़ियों और नेताओं में सीधा सम्बन्ध हो गया है. पहले ऐसा नहीं था और खेल तथा खिलाड़ी के बीच धन का कोई रिश्ता नहीं होता था. मेरा विश्वास है कि हमारे प्रतिभावान खिलाड़ी राजनेताओं की इस चाल को समझ लेंगे कि नेताओं द्वारा सुझाये लालच के रास्ते पर चलकर वे स्वयं अपने राजनैतिक भविष्य के लिये सस्ती लोकप्रियता ही हासिल करना चाहते हैं, देश की नाक ऊंची करने और खेल में कौशल का इज़ाफा करने का उनका न तो कोई इरादा है न ही समझ.

Fear of GM Crops is genuine- Takes time to resolve


आनुवंशकीय रूप से परवर्तित की गयी फसलों और इनके बीजों से तैयार खाद्य पदार्थों के बारे में एक अंतहीन बहस पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से भारत के विभिन्न हलकों -प्रेस, पत्रिकाओं, एन.जी.ओज. फोरम और सरकार में जारी है. अब यह हमारे घरों कि चार दीवारी और बैठकों में भी पहुँच गयी है -भला हो टी.वी वालों का. कहीं इस नयी तकनीक के विरुद्ध कथन जारी किये जाते हैं और कहीं पक्ष में लेकिन समझौता कहीं नहीं होता. जनता बेचारी परेशान है कि किसकी सुनें और किसकी नहीं. उधर बायो-तकनोलोजी कम्पनियां अपना काम जस का तस कर रही हैं -कहीं लालच देकर, कहीं पैसा बिखराकर या रिश्वत देकर, कहीं रेगयूलेट्री संस्थानों के अधिकारियों और कर्मचारियों को भ्रष्ट करके तो कहीं दादागिरी से तो दूसरी और आमजन की उदासीनता या फिर अल्पज्ञान कि वजह से. एन.जी.ओज दिल्ली या दूसरे महानगरों में एक-आध मीटिंग करके और प्रेस में मुद्दे को उछालकर ही खुश हो जाती हैं की चलिये काम बन गया. सरकार और कम्पनिओं पर दबाव बना है, कुछ डर भी पैदा होगा. लेकिन होता कुछ नहीं. हो वही रहा है जो कम्पनियां चाहती हैं. इनके प्रति सरकार की गंभीरता और वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता कभी-कभी संदेह के दायरे में आती रही है. सचाई तो यह कि पहले आनुवंशिकी परिवर्तन कुदरत करती थी, जिसमें देर से काम होता था. अब यह काम मनुष्य ने सीख लिया है, हुनरमंद हो गया है इसलिये तेज़ी से कर सकता है. इसमें बड़ी कमाई है लेकिन क्या कोई सुरक्षित और बिना बेईमानी का रास्ता बचा हुआ है. यदि कम्पनियां और सरकारें लोगों का वास्तव में ही भला चाहते हैं तो फिर इतना पुश क्यों ? जाहिर है लालच के कारण. इस से भी बड़ा मुद्दा है सरवाईवल का. वास्तव में इसके बारे में हमारी डर 'शायद' नाजायज़ हैं. वैज्ञानिक, जरूरतों के हिसाब से भी और नया खोजने की वजह से कुछ काम करते रहते हैं. शोध और खोज के लिये व्यक्तिगत सम्मान मिलना काम करने के बाद इसका एक विस्तृत पहलू बन जाता है, लेकिन न्याय जीवों अथवा न्याय पौधों की ऐसी प्रजातियों का विकास जिनके सुरक्षित होने के बारे में हमारी जानकारी अभी पूरी अथवा पूरे तौर पर सही नहीं है, उन्हें मुक्त या खुले वातावरण में लाने के लिये जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये. ऐसे जीव या पौडे अपने परिवेश में पूर्व में मौजूद जीवन से किस प्रकार प्रतिक्रिया करेंगे, इस बारे में समुचित जानकारी यदि नहीं जुटाई जाती तो ऐसे परिवर्तनों की शुरुआत हो सकती है जिनका कोई तोड़ हमें मालूम नहीं होगा. जेनेटिकली मोडीफाईड आर्गेनिज्म से बनाई गयी दवाओं के बारे में सकारात्मक तर्क देकर हम फसलों और खाद्य पदार्थों के बारे में निर्णय नहीं ले सकते. दोनों की जैविक प्रक्रिया और प्रोद्योगिकी बिलकुल अलग होती है. दवाओं के बारे में लम्बे अरसे तक क्लिनिकल ट्रायल किये जाते हैं जबकि फसलों के बारे में अक्सर जल्दबाजी होती देखी गयी है. अभी हरियाणा के जिला कैथल के एक गाँव में जी. एम्. मेज़ अर्थात जेनेटिकली मोडीफाईड मक्का के फील्ड ट्रायल किये जा रहे हैं जिसकी इजाज़त प्रादेशिक सरकार और केंद्र सरकार के बायो-टेक्नोलोजी विभाग ने दे दी है. दूसरी और इसी मसले पर हमारी संसद द्वारा नियुक्त सांसदों के एक पैनल ने ठीक इसके उलट अपनी राय दी है जिस पर बिजनेस स्टेंदर्ड अखबार ने अपने २२ तारीख के अंक में उक्त परीक्षण के पक्ष में लिखा है और परीक्षण के विरुद्ध सोच रखने वालों के बारे में कहा गया है की वे विज्ञान-रोधी हैं.

Saturday, 25 August 2012

Need to set up a Science & Lingustics university at Meerpur (Rewari)

दिनांक २५ अगस्त के दैनिक भास्कर में छपी खबर कि 'यूनिवर्सिटी बनाने के लिये पंचायतें भी आगे आयीं' एक उचित कदम कहा जा सकता है. अहीरवाल क्षेत्र में एक विश्विद्यालय की जरूरत थी, इसीलिये जिला महेंद्रगढ़ में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी. लेकिन मीरपुर गाँव में रीजनल सेंटर का दर्ज़ा बढ़ाकर विश्वविद्यालय किये जाने की जरूरत है या नहीं इसके लिये विमर्श करना होगा और खर्चे का अनुमान भी लगाना होगा. विश्वविद्यालय की स्थापना करने को कहना आसान होता है लेकिन इसे स्थापित करना और कुशलतापूर्वक संचालित करना एक चुनौती. मीरपुर में एक विश्वविद्यालय बनायें लेकिन सामान्य नहीं. इसे विज्ञान और भाषा शास्त्र के अध्ययन के लिये विशेष रूप से स्थापित किया जाये तो बात बने. हरियाणा की बोलियों पर अध्ययन करने के लिये अभी किसी भी विश्वविद्यालय में प्रबंध नहीं है. भाषाओँ अर्थात लिंग्विस्टिक्स में विशेष अध्ययन और शोध के अलावा प्रलेखन को बढ़ावा दिया जाना एक निहायत ही वैज्ञानिक जरूरत है जिसे तत्काल शुरू किया जाना चाहिये अन्यथा हमारी बोलियों का शब्द भण्डार रीता होता रहेगा. पहले ही अनेक शब्द प्रचलन से बाहर हो चुके हैं. भला हो आचार्य जगदेव सिंह ढुल का जिन्होनें सन १९७१ तक हरियाणा की भाषा बांगरू पर शोध कार्य संपन्न कर लिया था. उनके सहोद ग्रन्थ को सन १९७३ में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने 'ए देस्क्रिप्तिव ग्रामर ऑफ बांगरू' शीर्षक से प्रकाशित किया था. वे ९८ वर्ष की आयु तक भी हरियाणी भाषा की व्याकरण पर काम करते रहे थे.

खैर, हरियाणा में मीरपुर में अगर विज्ञान के विषयों के अद्ध्ययन एवं शोध के लिये विश्वविद्यालय की स्थापना के लिये जोर लगाना चाहिये क्योंकि इससे तरक्की के नये रास्ते खुलेंगे.


इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी है कि हरियाणा सरकार गुड़गांव के सैक्टर ६८ में एक नया विश्वविद्यालय बनायेगी. शायद यही वज़ह है कि मीरपुर में उसकी दिलचस्पी नहीं है. अहीरवाल के लोगों को होशियारी से काम लेना होगा.
 

Jats don't need status of reservation in State of Central jobs

दिनांक २५ अगस्त के दैनिक भास्कर में 'खापों के हाथ आन्दोलन की कमान' और ऐसे ही अन्य शीर्षकों से हिंदी भाषा के अन्य अखबारों में छपे समाचारों के अलावा अंग्रेज़ी के द ट्रीब्यून में 'खाप्स सर्व अल्टिमेटम' समाचार से हरियाणा के आम आदमी को किसी बेहतर भविष्य की आशा नहीं होनी चाहिये. जाति के नाम पर आरक्षण देने के लिये भारत के संविधान में कोई प्रावधान नहीं है, खाली इसके कि नीति-निर्देशक सिद्धांतों में ऐसी नीतियाँ बनाने के लिये कार्यपालिका को निर्देश मात्र है कि गरीब तबकों और समाज में पिछडे वर्ग के कल्याण के बारे में सोचा जाये और यथार्थ रूप में कुछ किया भी जाये. राजनेताओं नें अपने स्वार्थ के लिये समाज में जातीय गतिरोध के बीज आरक्षण देकर बोये थे, अब भारत में उसकी फसल लहलहा रही है. इस समय भारत, खासतौर से हरियाणा, में रहने वाले जाट कौम के कुछ अनपढ़, अदूरदर्शी, स्वार्थी, छुटभय्ये और स्वयंभू नेताओं को जाटों के लिए आरक्षण हेतु आन्दोलन करने के अलावा और कुछ नहीं सूझता. इस काम में वे पिछले २-३ साल से जोर-शोर से लगे हुए हैं और राजनेताओं पर दबाव बना कर, धमकी देकर और कुछ नालायक, कामचोर और स्वार्थी जाटों को साथ लेकर मनमाने तरीके से समाज में अराजकता पैदा करने पर तुले हुए हैं. ये लोग किसी की सही बात सुनने के लिये तैयार नहीं हैं चाहे तो इनके कारनामों की वजह से कौम पर बट्टा ही क्यों न लगे, इल्ज़ाम क्यों न लगे और जाट चाहे और भी दुखदायी तरीके से क्यों न पिछड़ जायें, इसकी उन्हें परवाह नहीं है. आज जाटों की गन्दी आदतों के कारण भारत के किसी भी प्रान्त में इन्हें पसंद नहीं किया जाता. कोई भी प्राइवेट संस्थान इन्हें नौकरी में, चाहे वह चौकीदारा ही क्यों न हो, रखने के लिये तैयार नहीं है. केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के जिन दफ्तरों में इनमें से ज्यादातर को क्लास फोर से भी नीचे के दर्जे की नौकरियां मिली हुयी हैं वहां ये ठीक से काम नहीं करते. समय पर दफ्तर में आते-जाते नहीं, दफ्तर के समय को भी बर्बाद करते हैं, उल्टा बोलते हैं, हुकुम-उदूली करते हैं और मौका लगे तो गाली-गलौच करते और मार-पीट भी करते पाये गये हैं. बयिन्तिहाह बीडी पीना और ताश खेलना तो ये लोग अपना जातीय गौरव मानने लगे हैं. दूसरी और आरक्षण के नेता-लोग जाटों के गौरवशाली इतिहास, कौम के जीवट और पुरुषार्थ, कुर्बानियों और परम्पराओं को दरकिनार करके केवल चंद लोगों को बेवक़ूफ़ बनाते घूम रहे हैं. और कुछ नहीं सूझा तो अब खाप के नासमझ और ज्यादातर अनपढ़ चौधरियों के पास समर्थन के लिये चले गये और इनके नाम पर सरकार को धमका रहे हैं कि यदि फलां-फलां तारीख़ तक आरक्षण देने के बारे में घोषणा नहीं हुई तो चक्का जाम और जनजीवन की सामान्य गतिविधि को ठप्प कर दिया जायेगा. धमकियों से भला सरकारें कभी डरी हैं, वह भी तब जब उसमें चोरों और लुटेरों का बोलबाला हो ? दूसरी बात यह कि यदि यह आरक्षण वाली बात सिरे चढ़ती है तो कल के दिन जैन, राजपूत, ब्राह्मन और अन्य ऊपरी कौमें जैसे की बनिया भी आरक्षण में अपना हिस्सा तय करने को कह सकते हैं. बात और आगे बढ़ती है और कोई विकल्प नहीं रहता तो हमारे अदूरदर्शी और स्वार्थी नेता तब अंग्रेजों की तरह समानुपातिक आरक्षण अथवा प्रतिनिधित्व की नीति को लागू करने में देरी नहीं करेंगे. जब यह होना ही है तो सरकार और 'जनप्रतिनिधि' इतने हो-हल्ले का इंतज़ार क्यों कर रहे हैं ? सामाजिक न्याय की अगर बात करें तो वह पिछले ६० बरसों में आरक्षण के जरिये तो संभव हुआ नहीं है. सरकारी नौकरियों में ही आरक्षण का फायदा केवल कुछ लोगों को हुआ है. देश में दरिद्र तो हर कौम और तबके में होते हैं. तो फिर दरिद्रता के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती ? जिस देश में गाँधी और अम्बेडकर जैसे प्रबुद्ध, विचारशील और तार्किक लोगों को भगवान् बना दिया जाये और उनके नाम पर न जाने क्या-क्या प्रपंच रचे जायें वहां जातीय भेद-भाव को समाप्त करना नामुमकिन हैं. व्यक्तिपूजा से सामाजिक समानता को अघात पहुंचा है. ऊंची कौमें जैसे कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वणिक चाहे निचली जाति के लोगों और संकर जातियों से कितना ही अच्छा व्यवहार क्यों न कर लें, निचली जातियां उन्हें हमेशा संदेह की दृष्टि से देखती हैं और देखती रहेंगी, यह सोचकर कि वे किसी भी सूरत में उनसे रोटी-बेटी का नाता नहीं जोड़ने वाले हैं. निचली जाति का कोई लड़का अगर उच्च कौम की किसी लड़की के प्यार के चक्कर में फँस गया या उसे भागकर ले गया तो समझो कि हिंसा होगी. इसमें कानून भी क्या करेगा क्योंकि परंपरा से ऐसा होने की वर्जना जो है. आरक्षण की बात करने वाले और कानून बनाने वाले लोग अपनी बेटियों का रिश्ता नीचे वाली जातियों या कुलों में करके मिसाल कायम कर भी दें तो भी ज्यादातर समाज इस रास्ते पर नहीं चलेगा. खैर, सरकारी नौकरियों में आरक्षण कि मांग करके जाट कौम के कुछ बुद्धिहीन लोग कौम का कोई भला नहीं कर रहे हैं. अगर इन्हें अपनी कौम के भविष्य की इतनी ही चिंता है तो वे आरक्षण को समाप्त करने के लिये दबाव क्यों नहीं बनाते. क्या पिछले दिनों हुआ गुर्जर आन्दोलन इनके लिये एक आदर्श उदाहरण बन गया है ? गुर्जरों से पहले यह पूछो तो सही कि आरक्षण होने के बाद क्या उनकी कौम के सभी युवाओं को सरकारी नौकरी मिल गयी है ?

आरक्षण के इस देश में दो मायने हैं - एक, विधायी संस्थाओं में और दूसरा, नौकरिओं के लिये. मैं और आप सभी ऐसे अनेक युवाओं को जानते होंगें जो हर लिहाज से काबिल हैं और वे सिस्टम और प्रक्रिया को कानूनी तरीके से मानते हुए भी उम्र रहने तक सरकारी क्षेत्र में रोजगार प्राप्त नहीं कर सके. हार कर उन्होनें या तो प्रोपर्टी डीलर बनना चुना, अपराध करना या फिर किसी प्राईवेट नौकरी में कमतर पैसों में नौकरी करना. कुछ ने अपनी दुकानें खोली जिनमें से कुछ कामयाब हुईं और कुछ नहीं. कुछ नें तो भैंसें रख कर डेयरी कर ली और बड़े नगरों में मोटर साईकिल वाले दूध सप्लायर बन गये. आरक्षण का फायदा जिन्हें हुआ उन 'निम्न' जातियों का यहाँ नाम लेने की जरूरत नहीं है लेकिन सरकारी नौकरी मिलते ही ये लोग मगरूर हो गये हैं और आजकल अपने से वरिष्ठ कर्मचारियों और अफसरों को अभिवादन तक नहीं करते. पता नहीं इसमें रहस्य है अथवा साजिश अथवा बदले की भावना ?

उच्च जाति के नौजवानों को सरकारी दफ्तरों या बैंकों से जब भी काम पड़ता है तभी रिश्वत दिये बिना काम नहीं होता जबकि 'निम्न' जातियों के जो लोग अफसर बन गये हैं वे अपने लोगों का काम तत्परता से कर देते हैं. बस काम करवाने वाले को अफसर की जाति पता होनी चाहिये. एस.सी. और एस. टी. लोगों ने प्रत्येक दफ्तर में अपने ऐसोसिएशन बना लिये हैं और गलती से अगर जातिसूचक शब्द किसी अन्य के मुंह से निकल गया तो समझिये कि नौकरी के लाले पड़ सकते हैं जब कि इन्हीं में से कुछ भले लोग अन्य को पंडितजी या चौधरी साहब कह कर रोजाना ही संबोधित करते हैं. इनकी शिकायत एस.सी. या एस. टी. कमीशन को होती है और एक बार ऐसा हो गया तो सजा से बचने के लिये उनकी दया पर ही निर्भर होना पड़ता है, नौकरी को खतरा हो गया वह अलग. हो सकता है डिमोशन भी हो जाये. मुल्क में ऐसी व्यवस्था और जानबूझ कर नई एवं बेतुकी प्रणाली चालू करने का क्या औचित्य है ? ऐसे माहौल में तरक्की नहीं हो सकती और वही सब होगा जो मुल्क को गर्त में ले जाने के लिये अब हो रहा है. चाहे लाख अन्ना और केज़रीवाल आयें; भ्रष्टाचार को नहीं होने देने के लिये लोग-दिखावा तौर से चाहे कितने ही सख्त कानून बनाये जायें, तरक्की नहीं हो सकती. आजकल तो गोपाल कांडा जैसे लोग ही ज्यादा सफल हैं बशर्ते उनके राजनैतिक आका उन पर मेहरबान रहें. उल्टा किसानों की जमीन छीनने के लिये पुराने कानून को गलत बता कर या उसका गलत इम्प्लीमेंटेशन करके और साथ में किसानों को पैसे का लालच देकर जमीन हथियाने के सभी संभव उपाय किये जा रहे हैं. हथियाई गयी जमीन में से बहुत सी तो प्राईवेट डेवलपर्स को ऊपर का पैसा लेकर बांटी जाति जाही है. जितने भ्रष्ट और निम्न-स्तरीय जनप्रितिनिधि आजकल देखने को मिलते हैं इतने तो अंग्रेज़ कभी नहीं हुए थे. इसीलिये बड़े-बूढ़े अक्सर कहते हैं की इससे तो अंग्रेजों का राज़ ही अच्छा था. आजकल तो दुष्टता और ध्रष्टता की हदें पार हो गयी हैं. इसीलिये भारत के बेहतरीन दिमाग पलायन या राजनीति को श्रेष्ठ मानते हैं.

जितना जल्दी जाट जाति की खाप के मुखिया इस आन्दोलन के सर्वविनाशक रूप को पहचान लेंगे, कौम के लिये उतना ही अच्छा होगा. अपने आप को वीर और मेहनती कहने वाली जाट कौम क्या अब आरक्षण की बैसाखी के सहारे अपनी रक्षा करेगी और रोटी कमायेगी ? और यदि आरक्षण मिल गया तो इनमें और उनमें फिर फर्क ही क्या रह जायेगा ? यदि फर्क डालना है तो आरक्षण हासिल करके नहीं बल्कि आरक्षण ख़त्म करवाकर डालना चाहिये और यह देखना चाहिये कि किसी के साथ भेद-भाव न हो. सभी को काम मिले और समाज में शांति से परिश्रम करते हुए, ज्ञान अर्जित करते हुए तरक्की करें. तभी भारत चीन की तरह ऊंचा और ताकतवर हो सकेगा.

वर्तमान में कांग्रेस पार्टी की जो यू.पी.ए. सरकार केंद्र में भ्रष्टाचार के शिखर पर बैठ कर रोजाना लोगों की गालियाँ सुनती है वह अब इतनी बेशर्म हो चुकी है कि नौकरियों में एस.सी और एस.टी. कर्मचारियों के लिये प्रोमोशन में भी आरक्षण देने के वास्ते संविधान में १५०वां संशोधन करने पर तुली हुयी है. इसके बड़े विपरीतकारी प्रभाव हो सकते हैं. इससे दफ्तरों में सामाजिक माहौल और कार्यक्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. इस आशय की ख़बरें सभी समाचार माध्यमों में प्रमुखता से आयी हैं.इस आशय की ख़बरें सभी समाचार माध्यमों में प्रमुखता से आयी हैं.

Thursday, 23 August 2012

Searching eminent personalities -Haryana (post 1947)

Just a fortnight ago at home I was cleaning my bookshelves and chanced upon a small size book entitled –‘Punjab’s Eminent Hindus’ published sometime in 1943-44 by New Book Society, Lahore, a great centre of learning and of course publication in those days west of Delhi, which the capital of British India. A few years ago the book was obtained as gift from the personal collections of (Late) Hukum Singh ji, posthumously. He was formerly a Principal at Jat College of Education, Rohtak. During his tenure as Principal he was tirelessly engaged in enormously enriching the library of this institution by acquiring hundreds of books that became as prized possessions. Despite protests from his own faculty members and the management he could convince them that the books are a major source of acquiring knowledge by both the teachers and the students whom they taught. Having regret in mind for others for not paying heed, he pursued his mission with unceasing appetite for acquiring good books for both himself and the College of Education and reading them for enhancing his knowledge. Later, he authored a magnificent 500-page treatise entitled –The Jats, throwing immense light on the proto-history of this valiant pastoral race.

However, the Shri N.B.Sen who had edited the book‘Punjab’s Eminent Hindus seems to have made careful selection of both the articles and their authors whose names appear in the Book. The book’s contents reveal brief life sketches and achievement of 20 eminent personalities of the era – S/Sh Chhotu Ram, Ganesh Dutt Goswami, Ganga Ram (Sir), Gokul Chand Narang (Sir), Gopal Das, R.B., Mahatma Hans Raj, (Dr.) Lala Har Dayal, Lala Harkishen Lal, Sir Jai Lal, Drishna Kishore, D.B., Lala Lajpat Rai, Sir Manohar Lal, Mukand Lal Puri, R.B., Raja Narendra Nath, Bhai Parmanand, Ram Saran Das, R.B., Swami Ram Tirath, Sir Shadi Lal,Swami Shraddhanand and Sir Tek Chand. The articles on personalities also depict on one full page the photographic representation of the portrait of each one albeit in blue ink. The editor dedicated the book to the memory of the Late Sardar Dayal Singh Majithia, one of the greatest benefactors of Punjab. He was the one who established colleges and public libraries across undivided Punjab and Delhi in addition to starting of The Tribune at Lahore. An inside page tells that the publisher intended publishing its Urdu and Hindi version, too. It cannot be confirmed now after a gap of 67 years when lots of political upheaval has occurred and Lahore is on the other side of the international border, unfortunately.

I must share as to why I recaptured the above story and why I shared it on the Face Book. After reading the book it occurred to me that must be a sequel and, therefore, I  started making a mental search for names that could be considered eminent in the last 60 years, particularly from 1948 to 1997 and which belonged to the territories of post partition Punjab. Haryana came into being on 1.11.1966. Obviously my interest is in Haryana and all names that can be included in the sequesl should be from Haryana only. Several names flashed in my mind but until now I could shortlist only one -Late Mahendra Singh Randhawa and Chaudhary (Seth) Chhaju Ram of village Alakhpura in district Bhiwani (then Hisar). Several other names, from the book – ‘People and personalities of Hisar’, which I read a decade ago and gifted to me by Prof. Madan Mohan Juneja, the author and an eminent historian, have occurred.

The second and immediate reason of telling the story is a ‘middle’ published on the editorial page 20 August 2012 in The Tribune, which Prof. Ranbir Singh authored. It briefly reflects on the personality and psyche of Mr. Hardwari Lal and recalls a few amusing anecdotes. The timing for the publication of the article as ‘middle’ piece is mystifying. However, people used to say (with apologies to those whom it may hurt) that Chaudhary Hardwari Lal had become ‘insane’ whereas he could be suffering from ‘compulsive obsession’, a disease. It is sort of mania and under its influence a person considers his status as righteous, unchallengeable, undefeatable and above all. I had met him on a couple of occasion and found him forthright and sane. He was so meticulous in details having exceptional skills of interpretation with full command over language that people generally could not afford his intensity and was either gave way in accordance with his desire or accepted withdrawal. He had a winner’s spirit and ‘defeat’ was a word that he had eliminated from lexicon. He lived a simple life and understood the real meaning of the word –written or spoken. Politicians and academicians used to timidly tow his line and avoided confrontation fearing that he would drag them in court. He surely was an antic as the people often told about him in lucid narrations during informal symposiums that used to be held in every village Chaupals and Baithaks throughout the village estates of central Haryana.

I never met Dr. Swaroop Singh about whom my impression was of a scholar with mild manners. It was never heard that he ever boasted or caused any hurt or confronted anyone despite holding high positions until his demise. Now, I can say that he qualifies to be an eminent person, post 1947. Another name could be Chaudhary Bansi Lal but nobody could have known about him had he not come into politics just by a providential tern. I would like mention of one more name: (late) Principal Hukum Singh of All India Jat Heroes Memorial College and Chaudhary Harnand Rai, another educationist of school level. Both served the same Institution at Rohtak during the 1960s and used to be highly regarded in the community as well as outside the community. I was a student at Jat College when Hukum Singh ji held the post of Principal and knew him as a good teacher and stern disciplinarian. I have several vivid memories of the time as how he built up the college when it was financially lagging. Just from small contributions from the students he was able to raise a huge three storey high magnificent teaching-block for science students. There have been too  many persons that remained involved in scholarly pursuits and arts in Haryana in the last fifty years but my problem is to identify a person whose temperament and work stands above board. Who really pursued knowledge and art without any personal agenda and shared knowledge freely irrespective of his social or economic status. I know it would be hard to discover such a philanthropist as this.

The point I want to assert here is that the scholars in society must think about the persons that had contributed a lot for the benefit of society through philanthropy and benevolence. The munificence of such persons of high character must be brought to light by illustrated publications. The New Book Society also carried two announcement in their second Edition of the above book viz. ‘Punjab’s Eminent Muslims’ and ‘Punjab’s Eminent Sikhs’ both having brief life sketches of 25 personalities each. It could not be ascertained if the books on Muslim and Sikh personalities could be brought out and marketed; hopefully they were.

Will my friends and guides provide help in identifying personalities from Haryana (from 1947 to 1997) that may be categorized as eminent in the real sense?
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Accompanying Photo: Chaudhary (Seth) Chhaju Ram Lamba (Ref.-Jaat Veeron ka Itihaas by Capt.(Hony.) Dalip Singh Ahlawat, Vill. Dighal, Dist. Jhajjar (Haryana)

Tuesday, 21 August 2012

Masani barrage's unending wait for rains to fill the reservoir -Rewari

जिला रेवाड़ी में धारूहेडा के निकट मसानी बराज़ को सन १९७८ में तैयार किया गया था और यह अपेक्षा थी की इसके बाद कुदरत अपना काम करेगी. दैनिक भास्कर ने अपने १८ जुलाई के हरियाणा अंक में ब्रेकिंग न्यूज़ के अंतर्गत एक बड़ी ख़बर के तौर पर इस बराज़ के चालू न होने के बारे में चिंता जताई है और कहा है की उस समय २५० करोड़ रुपये खर्च करके इसका निर्माण किया गया था. उम्मीद थी की अच्छी बरसात होने पर जिला अलवर में स्थित तिज़ारा और नूह की तरफ के पहाड़ों से बह कर आने वाले पानी के रेले को यह बाँध र
ोकेगा और निकटवर्ती अंचल में मौजूद ४० गांवों के निवासिओं को इससे आर्थिक फायदा होगा. लेकिन अभी तक बाँध के पीछे का करीब ६० वर्ग किलोमीटर का आगौर खाली पड़ा है. मैंने गूगल अर्थ के सौजन्य से इस बराज़ और इसके आगौर को दखने का प्रयास किया और सफल हुआ. वैसे भी मैं खुद इस बराज़ के ऊपर से चार-पांच बार गुज़रा हूँ और इसके परिवेश को निहारा है. अगले दिन, अर्थात १९ अगस्त को भास्कर ने ख़बर का फोलोअप दिया तो पता चला की ४० प्रभावित गांवों के लोग एक महापंचायत करेंगे जिसमे वे प्रादेशिक सरकार से आग्रह करेंगे कि इसमें पानी लाया जाय ताकि न केवल भू-जल का स्तर ऊपर आ सके बल्कि उन्हें सर्दिओं की ऋतु में सिंचाई के लिये पानी भी उपलब्ध हो. इस मामले में गौर तलब है इस क्षेत्र में पिछले १०० साल में हुई मानसूनी और सर्दिओं में होने वाली बरसात का पैटर्न. यह डाटा न केवल हरियाणा सरकार के रिकार्ड में वरन भारत मौसम विभाग के पास भी उपलब्ध है. बराज़ के पीछे स्थित आगौर में केवल बरसात होने पर ही पानी भराव संभव है, अन्यथा नहीं. अब सवाल यह उठता है की अखबार ने इसमें कौन सा जल भरने की बात कही है ? और, वह जल अगर आयेगा तो कहाँ से और किस स्रोत से ? इस पर न तो चालीस गांवों के बुजुर्गों से बात की गयी और न ही सम्बंधित विभाग के अधिकारिओं से. प्रतीत होता है की उस समय ऐतिहासिक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्रादेशिक सरकार का बराज़ बनाने का निर्णय ठीक था लेकिन बिलकुल ठीक नहीं. हो सकता है यह निवेश एक राजनैतिक निर्णय रहा हो और उस समय स्थानीय लोगों को खुश करने के लिये यहाँ बराज़ बनाया गया हो. चलिये ३२ साल तक यथा मात्रा में बरसात नहीं हुई और जलभराव नहीं हुआ. लेकिन भविष्य में होगी या नहीं यह भी निश्चित नहीं है. ऐसे में सिवाय आशा के और कुदरत द्वारा होने वाले करिश्मे के इंतज़ार के अलावा दूसरा विकल्प नहीं दीखता. लेकिन बराज़ को तब तक बचाना होगा जब तक पानी आने का सपना पूरा नहीं हो जाता.

ग्लोबल वार्मिंग और एल-नीनो के अलावा भारत उप-महाद्वीप में औद्योगीकरण, शहरीकरण, वनों और गोचर भूमि की कमी, घास के मैदानों की सिमटन, विद्युतीकरण और मोटर-गाड़ियों से निकालने वाले धुऐं से बढ़ते जा रहे प्रदूषण आदि की वजह से बरसात के पैटर्न में विगत दो दशकों में भारी बदलाव आया है. सुना गया है कि हरियाणा सरकार बरसाती पानी को कहीं उत्तर से -संभवतः, घग्गर नदी से, बदरो-नेटवर्क के जरिये मसानी बाँध तक पानी लाने की जुगत में है. यह आश्चर्यजनक ही नहीं वरन असंभव होगा और इससे जिला कैथल, फतेहाबाद और सिरसा में नाली क्षेत्र में पारिस्थितिकी को भारी नुकसान हो सकता है. मसानी बाँध क्षेत्र की परिष्ठितिकी भी इससे प्रभावित हो सकती है. हो सकता है की ३२ साल बाँध की संरचना इतनी मजबूत ना रह गयी हो की वह पानी डा दबाव को सह सके जिससे राष्ट्रीय राजमार्ग-८ को भारी क्षति हो. यह वही मार्ग हो जो दिल्ली को जयपुर से जोड़ता है उर आगे अजमेर-अहमदाबाद और मुंबई तक जाती है.

जिला गुड़गांव के सन १९१० के गज़ेटीयर में लिखा है की उत्तरी राजपूताना और जिला गुड़गाँव की बरसाती पानी की निकासी और इसका बहाव उत्तर की और है. रेवाड़ी और इसके पूर्व की ओर के रेतीले, कंटीली झारियों से सराबोर मैदानों में उत्तर में स्थित काला पहाड़ को ओर से पानी का बहाव उत्तर की ओर है लेकिन यहाँ जब भी अधिक मात्र में पानी आया है तो उसने रेवाड़ी को ही डुबोया है. इसकी वजह है अलवर में स्थित तिजारा ओर गुड़गांव में स्थित नूह के पास काला पहाड़ का पश्चिमी वाटरशेड एवं साहिबी में आने वाला फ्लैश-फ्लड. इन स्थितियों में मुझे नहीं लगता कि कभी इतना पानी यहाँ पडेगा जिससे मसानी बाँध में पानी आये. कहीं दूर से पानी लाकर यहाँ जलभराव करना निहायत बेवकूफी होगी. इसे एक राजनैतिक मुद्दा बनने का अर्थ होगा विज्ञान -अर्थात मौसम, भू-भौतिकी और पारिस्थितिकीय अद्ध्ययन की समझ के बिना प्रकृति से छेड़-छाड़. इससे लोगों की मुश्किलें और बढ़ेंगी. सरकार का खर्चा और बढ़ेगा और जानकार लोग हरियाणा के इंजीनियरों, नीति-निर्धारकों और राजनीतिज्ञों को कम-अक्ल समझकर खिल्ली उड़ायेंगे.

Search for eminence of the benevolent kind in Haryana

Just a fortnight ago at home I was cleaning my bookshelves and chanced upon a small size book entitled –‘Punjab’s Eminent Hindus’ published sometime in 1943-44 by New Book Society, Lahore, a great centre of learning and of course publication in those days west of Delhi, which the capital of British India. A few years ago the book was obtained as gift from the personal collections of (Late) Hukum Singh ji, posthumously. He was formerly a Principal at Jat College of Education, Rohtak. During his tenure as Principal he was tirelessly engaged in enormously enriching the library of this institution by acquiring hundreds of books that became as prized possessions. Despite protests from his own faculty members and the management he could convince them that the books are a major source of acquiring knowledge by both the teachers and the students whom they taught.
Regrettably, he pursued his mission with unceasing appetite for acquiring good books for both himself and the College of Education and reading them for enhancing his knowledge. Later, he authored a magnificent 500-page treatise entitled –The Jats, throwing immense light on the proto-history of this valiant pastoral race.
However, the Shri N.B.Sen who had edited the book‘Punjab’s Eminent Hindus seems to have made careful selection of both the articles and their authors whose names appear in the Book. The book’s contents reveal brief life sketches and achievement of 20 eminent personalities of the era – S/Sh Chhotu Ram, Ganesh Dutt Goswami, Ganga Ram (Sir), Gokul Chand Narang (Sir), Gopal Das, R.B., Mahatma Hans Raj, (Dr.) Lala Har Dayal, Lala Harkishen Lal, Sir Jai Lal, Drishna Kishore, D.B., Lala Lajpat Rai, Sir Manohar Lal, Mukand Lal Puri, R.B., Raja Narendra Nath, Bhai Parmanand, Ram Saran Das, R.B., Swami Ram Tirath, Sir Shadi Lal,Swami Shraddhanand and Sir Tek Chand. The articles on personalities also depict on one full page the photographic representation of the portrait of each one albeit in blue ink. The editor dedicated the book to the memory of the Late Sardar Dayal Singh Majithia, one of the greatest benefactors of Punjab. He was the one who established colleges and public libraries across undivided Punjab and Delhi in addition to starting of The Tribune at Lahore. An inside page tells that the publisher intended publishing its Urdu and Hindi version, too. It cannot be confirmed now after a gap of 67 years when lots of political upheaval has occurred and Lahore is on the other side of the international border, unfortunately.
I must share as to why I recaptured the above storey and why I shared it on the Face Book. After reading the book it occurred to me that it must a sequel and, therefore, I made started making a mental search for names that could be considered eminent in the last 60 years, particularly from 1948 to 1997 and which belonged to the territories of both Punjab and Haryana. Several names flashed in my mind but until now I could shortlist only one -Late Mahendra Singh Randhawa and Chaudhary (Seth) Chhaju Ram of village Alakhpura in district Bhiwani (then Hisar). Several other names, from the book – ‘People and personalities of Hisar’, which I read a decade ago and gifted to me by Prof. Madan Mohan Juneja, the author and an eminent historian, have occurred.
The second and immediate reason of telling the story is a ‘middle’ published on the editorial page 20 August 2012 in The Tribune, which Prof. Ranbir Singh authored. It briefly reflects on the personality and psyche of Mr. Hardwari Lal and recalls a few amusing anecdotes. The timing for the publication of the article as ‘middle’ piece is mystifying. However, people used to say (with apologies to those whom it may hurt) that Chaudhary Hardwari Lal had become ‘insane’ whereas he could be suffering from ‘compulsive obsession’, a disease. It is sort of mania and under its influence a person considers his status as righteous, unchallengeable, undefeatable and above all. I had met him on a couple of occasion and found him forthright and sane. He was so meticulous in details having exceptional skills of interpretation with full command over language that people generally could not afford his intensity and was either gave way in accordance with his desire or accepted withdrawal. He had a winner’s spirit and ‘defeat’ was a word that he had eliminated from lexicon. He lived a simple life and understood the real meaning of the word –written or spoken. Politicians and academicians used to timidly tow his line and avoided confrontation fearing that he would drag them in court. He surely was an antic as the people often told about him in lucid narrations during informal symposiums that used to be held in every village Chaupals and Baithaks throughout the village estates of central Haryana.
I never met Dr. Swaroop Singh about whom my impression was of a scholar with mild manners. It never heard that he ever boasted or caused any hurt or confronted anyone despite holding high positions until his demise. Now, I can say that he qualifies to be an eminent person, post 1947. Another name could be Chaudhary Bansi Lal but nobody could have known about him had he not come into politics just by a tern of fate. I would like the mention of one more name: Shri (late) Principal Hukum Singh of All India Jat Heroes Memorial College and Chaudhary Harnand Rai,another educationist of school level. Both served the same Institution at Rohtak during the 1960s and were highly regarded in the community as well as outside the community. I was student at Jat College when Hukum Singh ji held the post of Principal and knew him as a good teacher and stern disciplinarian. I have several vivid memories of the time as how he built up the college when it was lagging. Just from small contributions from the students he was able to raise a huge three storey high magnificent teaching block for science students.
The point I want to assert here is that the scholars in society must think about the persons that had contributed a lot for the benefit of society through philanthropy and benevolence. The munificence of such persons of high character must be brought to light by illustrated publications. The New Book Society also carried two announcement in their second Edition of the above book viz. ‘Punjab’s Eminent Muslims’ and ‘Punjab’s Eminent Sikhs’ both having brief life sketches of 25 personalities each. It could not be ascertained if the books on Muslim and Sikh personalities could be brought out and marketed; hopefully they were.

Will my friends and guides provide help in identifying personalities from Haryana from 1947 to 1997) that may be categorized as eminent in the real sense?

Thursday, 16 August 2012

Indian Journal of Medical Research - Towards a centenary






ऐसा बहुत कम हुआ है की दुनिया में किसी शोध प्रकाशन पत्रिका ने अपने जीवन के १०० साल पूरे किये हों. इस मामले में इंग्लैंड से छपने वाली विख्यात विज्ञान पत्रिका नेचर का नाम लिया जा सकता है जिसे छपते हुए १५० बरस से ज्यादा हो चुके हैं. भारत में ऐसा उदाहरण संभवतः एक ही है: इंडियन जर्नल ऑव मेडिकल रिसर्च जिसे इंडियन काउन्सिल ऑव मेडिकल रिसर्च प्रकाशित करती है. यह सन १९११ की बात है जब अंग्रेजों ने इंडियन रिसर्च फंड एसोशिएसन की स्थापना करके भारत में आधुनिक आयुर्विज्ञान अनुसन्धान की नींव डाली थी. उन दिनों फौज के सामने ट्रॉपिकल कंट्रीज में व्याप्त संक्रामक रोगों से बचने अथवा उनका निदान एवं उपचार करने की जरूरत थी ताकि फौजी लोग हर समय और आकस्मिक जरूरत के समय भी उपलब्ध रह सकें. इसके अलावा स्थानीय खाद्य पदार्थों का उपयोग करके फौज़िओं के लिये पोषक आहार जुटाने की भी जरूरत होती थी. इसलिये अंग्रेजों की फौज के साथ जो डाक्टर लोग थे उन्होंनें शोध की जिम्मेवारी भी उठाई. दो साल के बाद यह महसूस किया गया कि इस शोध से जिस नये ज्ञान का सृजन हो रहा है उसे दूसरे लोगों से साझा करने के लिये एक पत्रिका का प्रकाशन किया जाना जरूरी होगा. इसलिये सन १९१३ में भारत में पहली बार आयुर्विज्ञान शोध पत्रिका के प्रकाशन के बारे मेंसहमति बनी. इसके लिये नाम सोचा गया इंडियन जर्नल ऑव मेडिकल रिसर्च. तब से लेकर आज तक इस पत्रिका का नियमित प्रकाशन किया जा सकना संभव हुआ है जोकि अपने आप में ही एक उपलब्धि मानी जा सकती है. सन १९४९ में देश की नयी जरूरतों के मुताबिक इंडियन रिसर्च फंड ऐसोसिअशन का नाम बदल कर इंडियन काउन्सिल ऑव मेडिकल रिसर्च अर्थात भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् किया गया. इसके कार्यक्षेत्र में विस्तार हुआ, फंड्स की मात्रा में इज़ाफा किया गया और देश के सामने आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में जो सबसे ज्वलंत समस्याएँ थीं उनके हल ढूँढने के लिये अनुसन्धान परियोजनाओं की शुरुआत की गयी. नित नये क्षेत्रों में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् के वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड की सिफारिशें सामने आ रही थीं कि इनमें काम करने की जरूरत है. पहले के दिनों में तो जर्नल में भारतीय डाक्टरों और जैव आयुर्विज्ञानियों द्वारा किये गये शोध का ही इसमें प्रकाशन संभव था लेकिन संचार क्रांति के आधुनिक समय में जब जर्नल ऑनलाइन हो चुका है और दुनिया के हर कोने के अनुसंधान कर्मी इसकी उपस्थिति और प्रकाशन की नियमित स्थिति को जान गये हैं तो गैर-भारतीय वैज्ञानिकों के लेख और टिप्पणियां भी इसके संपादक को मिलने लगीं. अब इन्हें भी छापा जाता है. इससे जर्नल के प्रदर्शन में तरक्की हुई. इस समय जर्नल को छपते हुए पूरे ९९ साल बीत चुके हैं. सौंवें की शुरुआत हो गई है. जर्नल को हमने एक जीवित हस्ती मान लिया है. जब किसी भी हस्ती का सौंवाँ साल लगता है तो परंपरा अनुसार उसकी जन्मशती मनाई जाती है. सो, जर्नल की शती मनाने का मन हुआ तो परिषद् ने ऐसा निर्णय भी ले लिया. जन्मशती पर कोई केक कटे अथवा हवन हो, ऐसी तो कोई बात शायद न हो लेकिन बौद्धिक अनुष्ठानों में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जायगी. सो, ऐसे फैसले लिये गये जो वैज्ञानिकों और शोध संचारकों के अलावा मीडिया को भी पसंद आयें और वे सार्थक तरीके से उनका उपयोग भी कर पायें. इनमें से एक तो यह कि जर्नल का काया परिवर्तन किया जाये -कवर बदल कर और अन्दर दी जाने वाली सामग्री में कुछ नए विभाग और विषय देकर. ऐसा नहीं है यह पहली बार किया गया है बल्कि भूतकाल में कई बार ऐसा हुआ जब जरूरतें बदली, संपादक बदले, तकनीक बदली और इसका प्रबंधन करने वालों की सोच बदली. ग्राफिक्स कला के इस्तेमाल से इस प्रकाशन का स्वरुप और मुखौटा कई बार बदला गया. इसकी कुछ छवियाँ यहाँ प्रस्तुत भी हैं.शोध जर्नल व्यवसायिक और लोकप्रिय दोनों ही हो सकते हैं. लेकिन सफलता तभी हाथ लगती है जब इसे अकादमिक स्तर पर सराहा जाये और इसकी मांग लगातार बनी रहे. आयुर्विज्ञान अनुसंधान मानवजाति द्वारा किया जाने वाला एक सतत प्रयास है और इस क्षेत्र में गतिविधि में नियमितता बनी रही है जो कि भविष्य में भी बनी रहेगी. इसलिये साख को कायम रखने के लिये संपादक मंडल के सामने नियमितता और गुणवत्ता बनाये रखना वास्तव में ही चुनौतियाँ रही हैं. संयोग से इंडियन जर्नल ऑव मेडिकल रिसर्च के संपादकों ने ऐसी सभी चुनौतियों का सामना किया और अगले साल सौंवें वर्ष में जब यह प्रवेश करेगा तो हाज़िर संपादकों- वर्तमान और भूतपूर्व दोनों, के लिये यह गर्वपूर्ण अवसर होगा . पिछले साल, सन २०११ में, जब परिषद् ने अपनी सौंवीं सालगिरह मनाई थी तभी आयोजित की गयी गतिविधिओं में जर्नल के इतिहास पर प्रकाश डालने के लिये परिषद् के वैज्ञानिक डा. रजनीकांत ने इस बारे शोधपरक एक लेख लोकप्रिय शैली में लिखा था जिसे परिषद् द्वारा नियमित और मासिक अवधि से प्रकाशित की जाने वाली पत्रिका - आई.सी.एम्.आर बुलेटिन में जुलाई-अगस्त २०१० अंक, में प्रकाशित किया गया था. यह अंक फुल टेक्स्ट पी.डी.एफ़ में परिषद् की वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है. जर्नल ने कई बार अपना चोला बदला, रंग बदले और प्रकाशित होने वाली सामग्री में गुणवत्ता बनाये रखने के लिये अनेक तजवीजें सोचीं. संपादकों की कार्यक्षमता और इसके सलाहकार मंडल के बौद्धिक स्तर पर ही यह निर्भर करता है किकोई नियतकालीन प्रकाशन अपने पाठकों के बीच कितना लोकप्रिय हो सकता है -खासतौर पर ऐसे समय में जब प्रकाशन की लागत बढ़ती रहे, मानक और दूसरे सम-विषयी जर्नलों से प्रतियोगिता जैसी स्थिति भी बनी रहे और संपादक-सञ्चालन मंडल में नये लोग आयें. ऐसा हुआ, लेकिन पहले वालों ने अपने कनिष्ठ सहयोगियों को भरपूर सक्षम बना कर ही छुट्टी की. जर्नल में कालांतर से ऐसे अनेक शोध लेख प्रकाशित हुये जिन्हें आज 'क्लास्सिक' कहा जाने लगा है. कुछ लेख इतने महत्व के हुए कि उन्हें एक ब्रेक-थ्रू माना गया और उन्हें उद्धरण-गौरव अर्थात 'साईटेशन क्लास्सिक' का दर्ज़ा हासिल हुआ. ऐसे ही कुछ लेखों ने भारत में राष्ट्रीय स्तर पर सेहत की पोलीसिओं में परिवर्तन के झोंके पैदा किये तथा निदान एवं उपचार के मायने ही बदल दिये. ऐसे १३ लेखों की पहचान की गयी है जिन्हें क्रमिक तौर पर जर्नल के आगामी अंकों में पुनर्प्रकाशित किया जायेगा. जर्नल के सभी अंकों में से गुजरना आज बौद्धिक आनंद पैदा करने वाला एक शानदार उपक्रम हो सकता है, बशर्ते कोई समय लगा कर इस आनंद को अपने अन्दर जगाना चाहे ! जर्नल के नियमित प्रकाशित अंकों के अलावा विभिन्न अवसरों पर विषय-विशेष पर आधारित अंकों का भी प्रकाश किया है -जैसे की एड्स, टी.बी., गर्भाशय ग्रीवा कैंसर, मधुमेह, पोषण और हड्डी-घनत्व एवं धातु-विषाक्तता आदि. इसके अलावा भोपाल गैस हादसे में पीड़ित लोगों की बीमारिओं पर शोध सम्बन्धी अंक, राष्ट्रीय पोषण संस्थान की स्वर्ण-जयंती के अवसर पर संस्थान की शोध उपलब्धियों की चर्चा बारे एक अंक और मलेरिया तथा पोषण पर भी विशेषांक प्रकाशित किये गये थे. ये सभी अंक संग्रहणीय हैं.जर्नल का सौवां साल पूरा होने पर परिषद् और संपादक मंडल को बधाईयाँ.

Saturday, 11 August 2012

Scientific bureaucracy killing the spirit of innovation in India

The following article was published in The Tribune, Chandigarh on 31st July 2012 and is posted here only for academic purpose with due apology to the publisher and the author (accessed through internet on 12.8.2012)
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Innovation is not just patents and ‘jugaads’The US and Germany have become global leaders of innovation not by disjointed kneejerk measures but creating a total environment that nurtures, mentors, educates and, finally, finances talent
Chandra Mohan
Seeing that innovation is a key index of developed societies, creation of a climate which fosters innovation was one of the key missions for the Knowledge Commission chaired by Sam Pitroda. Participation of both the Prime Minister and Finance Minister in a National Conference on Innovation last year reflected the priority. Announcements at this conference included establishment of a net-based “national knowledge network” and liberal funding of innovation. Large funds have already been placed at the disposal of every State Council of Technology, out of which Rs 1 crore has been passed on to each district. Following standard government practice, deputy commissioners have been assigned the responsibility for nurturing innovation in districts. The commission’s report specially commended our ‘jugaad’ culture.
It is high time we realised that innovation is far beyond ideas, patents or even jugaad’s. Ideas and patents are both mere dreams. Patent only provides legal protection to the commercial interests of the originator. Jugaad, for which Indians, Punjabis in particular, are globally recognised, are low-cost shortcuts for meeting exigencies. One of its most quoted examples is Punjab’s famous “Maruta” of the Seventies, which lasted for nearly 30 years. A 5hp engine mounted on a Jeep-chassis condemned by the Army became a multi-purpose public transport, portable pump-set, thresher driver, etc, for farms. Every component was a local contraption or from the scrap heap. Thousands plied on Punjab and Haryana roads. It was the only rural transport after dark during Punjab’s decade of terrorism. While the Maruta certainly filled a public need, it flaunted every public motor-vehicle Law: lighting, braking distances, direction indicators, reliability. Every poor developing society comes up with such cheap jugaads: Jeepney of the Philippines or power-tillers of Thailand. A list of thousands of jugaads was also compiled by Prof Anil Gupta of IIM-Ahmedabad via a village-level initiative through Gujarat called GIAN (Grassroots Innovation Augmentation Network) in the early Nineties. Liberally supported by the Department of Science and Technology, it has led to the creation of the National Innovation Foundation (NIF) to help upscale these innovations into commercial products. IIT-Mumbai has been roped in for engineering support. Annual conferences of the NIF have also been held with great fanfare. But the impact of this entire effort is insignificant. Let us remember that innovation by its definition is “something different which makes an impact on society.” Making an impact on society broadens the scope to including social innovations that have no commercial value. Bangladesh’s Grameen Bank of Mohammad Yunus, Sulabh Shauchalaya of our own Bindeshwari Pathak of Bihar are examples of outstanding social innovations. Innovation, therefore, includes the long, arduous and risky slog of giving life and rearing the foetus into a successful adult that has an impact on society. This second leg is obviously far more difficult: there are unknown risks, unforeseen hurdles, soiling of hands, frustrations and disappointments galore.

Treacherous road
The worst part is that the innovator’s struggle does not end with a successful launch. It is lifelong and there is never a moment of respite. A competitor could knock it off that pedestal at any time, with a ‘cooler’ product. Could you have ever imagined the century-old global icon Kodak being knocked out bankrupt by digital photography? Tata Nano illustrates the risks. With all the resources of Tata Motors, Chairman Ratan Tata’s vision of a Rs 1-lakh car mooted in 1996 matured into the frozen-design Nano only in 2006 and first commercial sale in July 2009 — 13 years of effort and thousands of crores of risk-investment in converting that dream into a deliverable shape. Priced at 50 per cent of competing models, Nano was hyped globally as the entry-level car for the rising middle-class of developing countries. But Nano too is facing hurdles with sales dropping. Nano’s protracted struggle has given competitors enough time to ready their models. Today’s globally-exposed customer seeks ‘total oomph’. Lowest price alone is not enough. Another recent example is the computer tablets, for which our present market of 80,000 is expected to grow to 15 million by 2015. The Akash tablet developed by Datawind — an NRI company of Canada — and priced at Rs 2,500 hit national headlines last year. Its Indian launch at a subsidised price of Rs 1,800 for student buyers was announced by Human Resource Development Minister Kapil Sibal with great fanfare. Quantities in millions were touted. Technical glitches in the first trial order of Jaipur University unfortunately destroyed the euphoria. Half a dozen global players spanning the entire feature and price spectrum ranging from Rs 3,000 of Ubislate to the global heartthrob Apple at Rs 29,000 have in the meantime joined the fray. Datawind has been left holding the can. Failure is a lifelong stigma in India.

Total ecology
It is high time we realised that flowering of innovation is not disjointed kneejerk steps. It needs creation and nurturing of a total ecology. Why and how did Stanford become the unchallenged magnet of innovation in the US? How has Germany fostered hundreds of family-owned medium-scale companies to become global leaders of innovation in their field and made Germany an economic powerhouse? Stanford’s romance with innovation began with the post-war establishment of HP by Bill Hewlett and Dave Packard in a campus garage for making new electronic instruments for its labs. Spiralling post-War industrial demand for electronic instruments soon turned HP into a global powerhouse. Scientists that they were, Bill and Dave helped young entrepreneurs freely in their tinkering. The university provided the ground to experiment and later, even some seed money. Nurtured closely by both, this informal partnership flowered into a magnet for innovators. By the Eighties, faculty began to understand the nuances and risks of business, and private venture finance from across the US flooded in to join the party. Financial success emboldened higher risks and turned Stanford into a Mecca for innovation. Strength of German medium businesses is rooted in the century-old partnership between higher education and industry forged by Robert Bosch. These family-owned businesses have not only survived two World Wars, but grown into unchallenged global leaders of technology. In like fashion, our edifice of innovation will be successful only if it is founded in an un-tinted understanding of ground realities — which have been bred by an age-old culture wherein prayer and renunciation are the salvation of life, dirtying of hands is infra-dig and meant for inferior mortals; education, even technical, is totally theoretical and by rote; and faculty, even for higher technical education, has zero contact with industry and application. Torch-bearer IITs are no different. It is unfortunate that this culture of isolation has also permeated deep into our CSIR and defence labs. Scientists live in their isolated ivory towers with no interaction with industry. Projects, therefore, stretch on and on; cost-effective commercial production figures nowhere.

Fertile ground
Radical change in governance, recruitment and promotion policies of institutions of higher technical education and national labs would alone pull them out of this groove. Creation of a ground fertile for innovation would require: Access to a large number of young students of higher technical education to select those with entrepreneurial potential to deliver their innovations. Ability to access mentors in a wide array of fields to guide, help and monitor innovators as they work on converting their dreams into reality. Their needs change from day to day: CA today, an architect tomorrow, a marketing specialist day after and, an industrial engineer a day later. Capability to organise practical courses in all facets of business: structures, organisation and management; accounting; marshalling resources, etc. Financial resources for Angel-funding. Connect to private venture capitalists (VCs) for Tier-I finance and beyond. Necessity of private VCs needs special emphasis. Risk-shyness in any government venture capital is inevitable (public accountability breeds it). There could be no better example than the Technology Development Board set up under the Department of Science and Technology in 1996 to spur research and development (R&D) and innovation. It has no shortage of funds since all monies collected through the R&D cess on imported technology (Rs 2,300 crore till FY-2010) are at its disposal. Despite being composed by the cream of India’s R&D community and three eminent industrialists, its total disbursement till last year was only Rs 890 crore, divided among 233 projects. Only one case of Rs 9 crore in equity; Rest all in soft loans. Since even an entrepreneurial society like the US has only been able to create an innovation ecology at a few places, and India is too vast and diverse, the best course would be to begin with pilot initiatives in technical institutions which proven connect with industry, and learn our way to success. Experiment can be refined and escalated as we learn. Creation of 150+ successful entrepreneurs in first four years should be the objective of each institution. To my judgment, a grant of Rs 3 crore to each institution should be adequate to set the ball rolling. PTU’s first advanced school in Mohali (dedicated to ‘total quality management’ (TQM) and entrepreneurship) is one such institution. Its connect with over 500 industries is well known. The historical link of PSG Institute in Coimbatore with industry is again renowned. Deeper search will reveal more such examples. Pilot experiments are the tools for entering a new domain. Let us not be in a hurry, and adopt the well-trodden path.

What’s not innovation
Punjab's famous contraption called 'Maruta' may seem a good example of ingenuity, but it fails to meet the requirement of innovation being something that makes an impact on society.

What is innovation
Hewlett-Packard, backed by Stanford University in research, innovated and transformed itself many times over, starting from a garage on the campus, and overcoming varied challenges along the way.

IT’s TOUGH
Tata Nano car and the tablet Akash were sincere efforts at innovation, but are facing rough weather owing to unpredictable outcomes.


The writer, a technologist and entrepreneurial professional, retired as Managing Director of the Mohali-based Punjab Tractors in 1997.

The following was sent as my response, which the
newspaper did not publish:

For over a century now we have amazingly witnessed as how innovations have proved a key to survival for many technology firms and Corporations in a world, which progressively becomes more competetive and aggressive in the arena of discovery and inventions. Innovation is a different domain than discovery or invention and must the understood in the context that it is applicable to an already existing process or product, which by the application of some new thought and consequently a modification in design  may add more elements to comfort, economy and aesthetics. Innovations had their diktat on technology managers, which were quick to discard old models and promoted news ones at discount when economy of production is achievable or attained. Its promotion and popularization through marketing and financial strategies may tell another kind of astounding success stories but the greatest advantage that new utilities, products or technologies offered to humanity were in fact not discoveries or inventions but a sort of rationalization for additional comfort, reliability, ease of use, cost cutting, economy in space and attractive forms. People quickly became adapted to technologically advanced products that became possible only by advancement in knowledge through constantly pursued research and new thought. It was not merely the huge funding that is only responsible for innovations but the persistent thrust in a people to do so. And, that has something to do with the basic character of a people that evolves in civilization in which they have lived. The technological devices that we see around in India and are quickly reported by the media as scoops are, in fact, not innovations -except a few ones, but only Jugaads that has no meaning for the manufacturers becauses it is aesthetically poor, has no safety element, not economic and not acceptable. Which, is why the innovations in respect of technology as listed by National Innovation Foundations has found few takers.

Assessing the worth of skillfulness for innovation about the people of a nation such as India requires careful documentation by experts. The listed technologies and other products of the skilled Indians, as uploaded on the website of the Innovation Foundation of India, were checked and delightfully it cannot disappoint Indians as huge numbers were depicted in its warehouse but surely the industry is not interested in any one of them. Obviously, the people who have compiled and handled this business  and peer reviewed did not care much about industrial suitability despite their being intelligent and were not able to push for their improvement and exploitation in public interest. The problem about which Mr. Mohan has spoken was about funding, planning and fulfillment of intermediate or auxiliary requirements that often suffered at the hierarchical levels in the bureaucratic world in India. Further, the commercial yield of such innovations as listed by the NIF, supported by the Department of Science & Technology, may remain the process of evaluation for ever!
 
In future, who may not aspire to earn billions  of rupees by using these technologies and 'knowledge' but the question that has always loomed large on Indians is: how soon and who will do it, when? Will CSIR, ICMR, ICAR, DST, IITs or R&D units of the industrial houses in the private sector will ever come forward to take up the challenge. The regrettable part of this business is gloomy taking in account the history of technology in India in addition to the structural deficiencies in the aforesaid Institutional set up, which has largely failed to harness knowledge and never believed in lifting technologies from their preliminary stages for further development and evolution so that market could bloom and the people benefited. It is only for this reason that creation of wealth never occurred in India at a scale seen in England and USA and, for these shortcomings, our tryst with poverty in several sector –technology, finance, education and other was never broken otherwise the  innovations could have changed the life of Indians. However, India has great potential for innovations in textiles, footwear, herbal medicine, technologies for non-conventional sources of energy, housing and a thousand others. Let us hope that NIF really delivers. However, time and again it has been proved that scientific bureaucracy evolved a self-destructive mechanism to kill the spirits of innovation in India. This happened despite tall claims made at the annual mela organized each year by the Indian Science Congress Association

Thursday, 9 August 2012

Need for decency towards sportspersons

ओलंपिक जैसे विश्वस्तरीय खेल स्पर्धाओं में जब हमारे खिलाड़ी कमतर मेडल लाते हैं अथवा हार जाते हैं तो हम अचानक ही या तो उनके हौसले पस्त करने के लिये उल-जुलूल वक्तव्य देते हैं अथवा उन्हें कोसने लगते हैं. उन पर तरह-तरह के आरोप लगाये जाते हैं और उनके साथ ऐसा बर्ताव करने लगते हैं जैसे उन्होंनें कोई भारी अपराध कर दिया है. इसके मुकाबले में दूसरे देशों में इस बाबत चुप्पी साधी जाती है और खिलाड़िओं को हतोत्साहित नहीं वरन अपने प्रदर्शन की वैज्ञानिक समीक्षा करने और उसे सुधारने का वक़्त दिया जाता है जिसमें वहां के शरीरक्रिया वैज्ञानिकों और आहार वैज्ञानिकों की पूरी मदद ली जाती है. हमारे यहाँ क्या होता है, यह बताने और समझने के लिये हमारे मीडिया में छपी रिपोर्टें ही काफी कहानी बयां करती दिखेंगी! हमें अपने दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन लाने की जरूरत है. ओलंपिक-२०१२ (लन्दन) से रजत और कांस्य पदक लाने वाले खिलाडिओं का स्वागत जिस प्रकार से एयरपोर्ट्स पर किया गया वह तो सब को दिखाई दे गया लेकिन जिन खिलाड़िओं ने उम्मीद से कम प्रदर्शन किया अथवा मेडल नहीं ले पाये, उनकी देश वापसी की क्लिप्स भी क्या मीडिया दिखायेगा ? अगर दिखायेगा तो आपको फर्क भी दिखाई दे जायेगा. कुछ लोग अभद्र टिप्पणियाँ करने से नहीं चूकेंगे. हमें इन खिलाड़िओं को 'हारे हुए' तो कभी कहना ही नहीं चाहिये. बल्कि कुछ कहे की बनिस्पत यह सोचना ज्यादा उपयुक्त होगा कि कड़ी प्रतिस्पर्धा में ये लोग पीछे रह गये लेकिन ओलंपिक खेलों के लिये मान्य स्तर को तो इन्होनें पार किया ही था. तब या तो हमारे प्रशिक्षण में कमी रह गयी या फिर तकनीक में. कोई भी खिलाड़ी जब ओलंपिक जैसी विश्व-स्तरीय खेल प्रतिस्पर्धाओं में हिस्सा लेकर वापिस लौटता है तो वह बहुत कुछ सीख कर आता है. वहां उनके प्रशिक्षक भी होते हैं जो हरेक घटना पर बारीक नज़र रखते हैं. हमारे खेल अधिकारियों और वैज्ञानिक संस्थाओं का दायित्व बनता है कि वे इन दोनों से बारीकी से प्रत्येक बात पूछें और उसे रिकार्ड करके बनाये गये दस्तावेजों का विश्लेषण करें ताकि आगामी वर्षों में हम उन कमिओं को पूरा कर पायें जिनकी ओर वैज्ञानिकों ने हमारा ध्यान दिलाया है.प्रसंगवश ध्यान दिलाना चाहूँगा कि अमरीका से हर सप्ताह छपने वाली विज्ञान की विख्यात पत्रिका 'नेचर' ने अपने १९ जुलाई २०१२ के अंक में खेल से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं पर चार लेखों का प्रकाशन किया था. वे चारों लेख यहाँ संलग्न हैं ताकि भाई लोग भी पढ़ सकें. हमारे यहाँ के किसी भी वैज्ञानिक संस्थान अथवा मीडिया प्रकाशनों ने ऐसा प्रकाशन-उपक्रम करने का कोई प्रयास किया ही नहीं. आश्चर्य होता है इस उदासीनता पर ! ईस्वी सन १९७१ में एक ही बार राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने 'खिलाड़िओं के लिये उपयुक्त आहार' नामक दस्तावेज़ तैयार किया था. उसके बाद कभी पता नहीं चला कि ऐसा कोई प्रकाशन दोबारा हुआ हो अथवा पूर्व-prakashit दस्तावेज़ को ही संशोधित कर पुनर्प्रकाशित किया गया हो. यह खेल और खिलाड़िओं के प्रति हमारी राष्ट्रीय उदासीनता का जीवंत उदाहरण है. हमारे देश में खेल आयोजन भारी मात्रा में रुपया बटोरने का स्वर्णिम अवसर होता है और कुछ नहीं. रही बात हरयाणा की खेल नीति की तो हमें नहीं मालूम कि इस दस्तावेज़ की निर्माण प्रक्रिया क्या रही थी, लेकिन, जब इसे सार्वजानिक किया गया तभी मालूम हुआ कि यह 'खेल और विज्ञान' की अपेक्षा 'खेल और धन' अथवा 'कामर्स' से सम्बंधित दस्तावेज़ ज्यादा है. इसे देख कर मुझे तो निराशा ही हुई थी. पता नहीं कितने प्रबुद्ध लोगों और पत्रकार भाईओं ने ठीक से इसका विश्लेषण किया होगा. लेकिन अब इस पर सार्वजनिक रूप से चर्चा होनी चाहिये नहीं तो विजेंदर जैसे मुक्केबाज खिलाड़िओं का भविष्य खेल में प्रगति दिखाने की अपेक्षा रुपया कमाना ही हो जायगा, राष्ट्रीय सम्मान और निज सम्मान गया भाड़ में!